#Kahani by Neha Agrawal Neh

” सपनों का महल ”

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अपने शानदार केबिन में कॉफी की धुंआ उड़ाते मग को वो अभी अपने लबों पर लगा भी नहीं पायी थी ।

की कानों में फिर से पापा की आवाज गूजंने लगी।

” तू समझती क्यों नही कमली की अम्मा रेत का महल लहरों की जद में आकर बिखर ही जाता है ,इस बच्चे को जन्म देकर तूने जो खानदान के नाम पर बट्टा लगाया है ना वो मिट नहीं सकता तुझे इस बच्चे को खुद से दूर करना ही होगा

और फिर सिसकती बिलखती माँ की परवाह ना करते हुये उसके बाप ने बेरहमी से उसका हाथ पकड़ा और रात के अन्धेरे में ना जाने कौन दिशा में जाने वाली ट्रेन में सात साल की मासूम कमली को जबरदस्ती बिठा कर गायब हो गया ।

घबरा कर कमली ने आँखे खोली ही थी की तभी इंटरकॉम पर मैसेस मिला की कुछ रिपोर्टर उससे मिलना चाहते है ।

उसके यस करते ही अन्दर आकर रिपोर्टरों ने सवालों की बौझार कर दी

” आपने खुद का चैनल खोलने का सपना ही आखिर क्यों देखा।”

” क्यों सपने देखने का हक क्या आप लोगों को ही है ।हमारी आंखों मे भी तो सपने सज सकते है ना ”

” हाँ जी सज सकते है पर एक किन्नर होकर आपका तो काम ही अलग है ना।”

” आप बताये किस किताब में लिखा है कि एक किन्नर सिर्फ गा बजा कर ही अपना पेट पाल सकता है ।मेरे चैनल में काम करने वाला हर किन्नर आज सम्मान के साथ दो वक्त की रोटी और बेशुमार नाम कमा रहा है ।जो थोड़े बहुत इलाज से ठीक हो सके हम उनके लिए भी काम कर रहे है । इलाज के बाद वो लोग एक सामान्य जिन्दगी जी रहे है ।।”

” पर मुश्किल तो बहुत हुई होगी ना ,

आपको यहाँ तक आने मैं ”

” हाँ यह तो सच है ,

जानते है आप लहरों की जिद थी मेरे सपनों के महल को बिखरने की पर मैं उनसे भी ज्यादा जिद्दी निकली मैनें लहरो पर कदम रख कर अपनी हथेली पर ही अपने सपनों का महल सजा लिया ।”    – ” नेहा अग्रवाल नेह “

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