# Kahani Pratiyogita 18 bySushila Joshi

( नाम )

अमेरिका से आकर मधु माथुर दिल्ली केएयरपोर्ट पर उतरी तो कस्टम की आवश्यक पूर्ति पूरी करने लिये कस्टम कक्ष में प्रवेश किया । सामान व व्यक्तिगत चैकिंग पूरी होने के बाद एक महिला अफसर ने कुछ कागजात मधु की ओर हस्ताक्षर करने के लिए बढ़ा दिए । जैसे ही मधु ने कागज मेज पर रख हस्ताक्षर करने के लिए झुकी तो -“हाय मधु !हाऊ आर यू ?” सुना तो मधु की आँखे ऊपर उठ गई और हाथ जहाँ का तहाँ रुक गया ।
“हाय मयंक ,कैसे हो तुम ?”-कहा और अपने काम मे जुट गई फिर ऊपर उठ मधु ने अपना हाथ मयंक की ओर बढ़ा दिया । हाथ मिला कर मयंक जैसे ही जाने के लिए मुड़ा की मधु के बराबर में खड़े सात आठ साल के बच्चे पर उसकी आँखें जा कर अटक गई । हृष्ट पुष्ट शरीर ,गोरा चिट्टा रँग , गोल गोल चिकने गाल ,आकर्षक आवारा कट बाल ,टांगो में एक हाफ पैंट , और उर लाल रंग की बनियान -सभी कुछ मिल कर बच्चे को बेहद आर्कषक बना रहे थे । केवल मयंक ही नही ,वहां उपस्थित सभी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था । मयंक आगे बढ़ा और उसके गालो को छू कर -“ए मधु , ये कौन है ”
“ते मेरा बेटा है भीष्म “-और तुरन्त दूसरी ओर मुड़ कर संकेत करते हुए बोली -“और ये मेरे पति है डॉक्टर असीम सक्सेना “।
मयंक आगे बढ़ा और असीम से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया । दोनों ने हाथ मिला और बातों का सिलसिला शुरू हुआ । बातों ही बातों में मयंक ने बताया कि वह कस्टम ऑफिस में काम करता है ।
मधु की आवश्यकताए पूरी हो चुकी थी । असीम और मधु भीष्म का हाथ पकड़ बाहर निकल गए और मयंक उनके कागजात देखने मे व्यस्त हो गया ।अचानक मयंक हड़बड़ा उठा और बाहर की ओर लपका । मधु व असीम दरवाजा पार करनेवाले ही थे कि मयंक की आवाज ने उन्हें रोक दिया । मुड़ देखा तो मयंक उन्हें हाथ हिला कर वापस बुला रहा था । दोनों मुड़े और उसके पास पहुँच गए ।मयंक उन्हें वापस कस्टम में ले गया और कागजात मधु की ओर बढाते हुए बोला -“मधु तुमने अपना सरनेम पुराना वाला ही लिख गयी । लो अपना सरनेम ठीक कर लो । ”
“मयंक मैं अभी तक भी अपना पुराना सरनेम ही लिखती हूं । मैंने अपना सरनेम नही बदला ।”
“लेकिन विवाह के बाद भारत मे तो स्त्री पति का सरनेम लिखती अपने नाम के साथ । अब तुम मधु सक्सेना हो ,मधु माथुर नही “मयंक ने हिचकिचाते हुए कहा ।
“मयंक मैंने केवल विवाह किया है और वह भी बिना किसी शर्त के । अपने पिता की दी हुई पहचान मैं पति के लिए नही मिटा सकती । उसे मैं कभी न तो मिटाऊगी और नही बदलूँगी “-मधु ने दृढ़ता से कहा ।
“लेकिन तुम एक बच्चे की माँ हो जो असीम का बेटा है भीष्म सक्सेना । ऐसा क्यों ?”तार्किक होते हुए मयंक पूछ बैठा ।
“वह इस लिए मयंक क्योकि मेरे बेटे का पिता सक्सेना है । मेरा पिता माथुर है इसलिए मैं माथुर हूं और जीते जी माथुर ही रहूंगी क्योकि मैं नाजायज औलाद नही हूं जिसे पति के नाम की आवश्यकता हो । हम दोनों के संसर्ग का परिणाम भीष्म है इसलिए उसे बाप का नाम मिल रहा है जो आवश्यक है ,मेरे लिए नही । “मधु ने दृढता से कहा
“लेकिन हमारा समाज पुरुष प्रधान है ।इसमें बाप का ही नाम चलता है “-,मयंक ने पस्त होते हुए कहा ।
“मैं कब इस समाज को नारी प्रधान बना रही हूं । हर बच्चा माता पिता की परछाई होता है ।बेटा अपने पिता के नाम से आगे बढ़ता है जिसे मैं उसे दे रही हूं और मैं अपने साथ अपने पिता का नाम जोड़ कर मरते दम तक निभाती भी रहूँगी । तुम्हे कुछ कानूनी आपत्ति है क्या “?मधु ने दृढ़ से दृढ़तम होते हुए कहा ।
“नही ऐसा तो कुछ नही है “-मयंक ने खीजते हुए कहा तो ऑफिस में खड़ी महिला अफसरों की जोरदार तालियां ऑफिस में गूंज गयी । “गिव ए बिग हैंड टू द रिप्रेजेंटेटिव ऑफ डिस वुमन वलर्ड ” के स्वर के साथ ऑफिस का माहौल विजेता हो उठा था और मयंक का पुरुषत्व पल पल पस्त होता दिख रहा था ।

सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर

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