#Kahani Pratiyogita 18 by Meena Godare Avni

जाएं तो कहां जाएं-

हाय नीरा,,,,, दूर से ही मंजू ने आवाज दी
अरे तू यहां? आश्चर्य से नीरा मंजू के समीप पहुंच गई,
‘मेरा फिर यहां का ट्रांसफर हो गया है अभी परसों ही तो आए हैं हम लोग, बस आज तेरे घर ही आने वाली थी पर तू इतनी बदल क्यों गई है ,,,,?कुछ सोचती सी नीरा का चेहरा पड़ती मंजू बोली।’
‘नहीं तो, चल घर चलते हैं मां भी तुझे देख कर बहुत खुश होंगी मीरा ने बात पलटी।’
मंजू समझ रही थी विगत तीन वर्षों में नारा के साथ कुछ तो अवश्य घटित हुआ है जिसे वह छुपा रही है
नहीं ,अभी नहीं शाम को आऊंगी फुर्सत से, चलती हूं
घर आते ही सोफे पर लेटी मंजू के सामने नीरा का वह खिले गुलाब सा मुस्कुराता चेहरा उसके वो टमाटरी गाल कजरारी बड़ी बड़ी आंखें और लहराते लंबे बाल जिसके कारण उसै कालेज सुंदरी का खिताब मिला था घूम गया।
आखिर क्या हुआ उसके साथ जो उसकी सुर्खियों को धंसी हुई आंखें पिचके गाल और श्याम वर्ण में तब्दील कर गया
बात बात पर उसका हंसना आज जबरन लादी मुस्कान में बदल गया विगत के परिदृश्य में पता ही ना चला शाम कब हो गई
एक अनिश्चित से भय और चिंता के साथ मंजू तैयार हुई और नीरा के घर पहुंच गई
ड्राइंग रूम में बैठते ही मंजू पूछ बैठी पहले तू यह बता तुझे क्या हुआ है क्या तू बीमार थी?
सच ,क्या तुझे कुछ भी नहीं पता है चल मेरे साथ मेरे कमरे में चल ,भरी आंखों से नीरा हाथ पकड़ कर उसे अपने कमरे में ले गई।
पलंग के पास ही सिरहाने टेबल पर रखी तस्वीर में नीरा को उस सुंदर युवक के साथ दुल्हन के रूप में देख कर मंजू सारी स्थिति समझ गई ,उसे एक जोर का धक्का लगा और वह पलंग पर बैठ गई।
मैं बिल्कुल अकेली हो गई मंजू,पियूष मुझे छोड़ कर चले गए पर मैं अभागिन पता नहीं क्यों जिंदा हूं
नीरा बिलख पड़ी ,घाव पुन:हरे हो गए उस की झील सी आंखों से आंसुओं का झरना फूट पड़ा।
यह सब कैसे हुआ ? मुझे तो यह भी नहीं पता कि तेरी शादी कब हुई बुझे स्वर में मंजू बोली
तुम्हारे यहां से जाने के बाद अचानक ही रिश्ता आया और जल्दी शादी हो गई ।अपनी ससुराल पहुंचकर पियूष जैसा सुंदर , समझदार और प्यार करने वाला पति और बेटी की तरह चाहने वाले सास-ससुर को पाकर मैं धन्य हो गई ,मैं बहुत खुश थी सच मंजू ,शादी के बाद दो वर्ष कैसे बीते कुछ पता ही न चला नीरा बोलती जा रही थी,,,,,
पियूष को अभी 1 वर्ष और हम दोनों के बीच में तीसरे का आना पसंद ना था हम दोनों ही अपनी दुनिया में मस्त थे
उनके साथ बिताया एक एक पल कितना सुखद था ।नीरा ने एक ठंडी सांस भरी और जाने कहां खो गई।
‘पर इतने कम समय में कैसे हुआ यह हादसा ? आंसु पोंछते मंजू
शायद किस्मत को यही मंजूर था ,
उस दिन मैंने आखिरी बार श्रृंगार किया था
मैं बन सवरकर पियूष की लाई साड़ी पहनकर बालों में गजरा सजा जेबों से लदी पियूष के आने का इंतजार कर रही थी ,हमने होटल और मूवी का प्लान बनाया था ।उस दिन हमारी शादी की दूसरी सालगिरह थी। कि अचानक फोन आया की पीयूष की गाड़ी ट्रक से टकरा गई है सुनते ही मैं बेहोश होकर गिर पड़ी ।जब होश आया तो पियूष की मृत देह मेरे सामने पड़ी थी मैं पत्थर का बुत बन गई थी
अभी तेरारहवीं भी नहीं हुई थी कि लांक्षनो और तानों की बौछार मुझ पर पड़ने लगी ।मेरी सास रो रो कर मुझसे कुलटा कुलक्षनी कहकर शायद अपने बेटे का गम कम कर लेती पर मैं मौन पीड़ा के सागर में डूबी रहती ।संवेदना का एक शब्द तो दूर मां तुल्य सास का यह बदला रूप मुझे अंदर तक खोखला कर देता
मैं अचंभित थी उनका यह रूप देख कर।
रोज रोज वही ताने मेरे बेटे को खा गई मेरी किस्मत फूटी थी जो इस मनहूस को घर लाए सत्यानाश हो इसका अरे मरना ही था तो तू मर जाती मेरे बेटे को क्यों नजर लगा दी अब तेरा क्या करना है उसके साथ तू भी क्यों नहीं मर गई आधी ताने सास के साथ रिश्तेदार भी मुझे देने लगे।

एक बाबू जी ही थे जो मेरी पीड़ा को समझते थे पर मां के डर से वह भी तो मुझसे संवेदना का एक शब्द नहीं बोल पाते थे।
पर तू यहां कब आई मंजू??
तू बोलती जा मैं सुन रही हूं ,,,,
हां एक तुम ही तो हो मंजू ,जिससे मैं अपनी दास्तान कह सकती हूं मुझे पाच माह बीत गए थे मैं पियूष की यादों के सहारे दिन काट रही थी कि उस दिन गर्दन झुकाए खाना खाते खाते बाबूजी बोले-
‘ नीरा तुम्हारा मन यहां नहीं लगता होगा, चलो मैं कुछ दिन के लिए तुम्हें तुम्हारे मायके छोड़ आता हूं , मैं चुप थी पर इतना बोलते ही खाना बीच में ही छोड़कर वह उठ गए मैंने इसका कारण पियूष की याद ही समझा।
दूसरे दिन ही मैं बाबूजी के साथ यहां आ गई यहां मुझे पाकर सभी खुश थे मां भैया भाभी और रिंकू पिंकू भी। यहां आकर मुझे कुछ राहत मिली कि चलो उस घर में नौकरानी की तरह किए जाने वाले व्यवहार से तो यहां अच्छा है। किंतु सुबह भाभी की तीखी आवाज में मुझे चौंका दिया
नीरा जल्दी उठो ,,,मुझे और तुम्हारे भैया को नौ बजे ही ऑफिस जाना होता है जल्दी से नाश्ता बना दो और दस बजे तक बच्चों को नाश्ता कराकर टिफिन लगाकर उन्हें स्कूल भेज दिया करो।
मेरे कुछ बोलने से पहले ही भाभी वहां से चली गई है भाभी के इस अप्रत्याशित व्यवहार के लिए में तैयार न थी ,भाभी का यह रूप मैंने कभी न देती था ।मन ही मन सोचने लगी इससे तो अच्छा मैं अपने ससुराल में ही ठीक हूं
बिस्तर से यह सोच कर उठी कि अभी बाबू जी से कह दूंगी कि वह हफ्ते भर बाद ही मुझे लेने आ जाए ।किंतु उसने सारे घर में देख लिया पर बाबूजी का कुछ पता न था मां ने उसकी नजरें पहचान ली बोली –बेटा बाबूजी तो सुबह जल्दी ही चले गए बोल रहे थे नीरा को हमेशा के लिए छोड़ने आया हूं अब उसकी उस घर में कोई जगह नहीं है, बहुत दुखी थे पता नहीं क्या विवशता थी उनकी ,मां ने आंचल से आंसू पूछते हुए बताया ।
मुझे अपने कानो पर विश्वास नहीं हो रहा थाअपने आप को तपते रेगिस्तान के बीच प्यास से व्याकुल बिल्कुल अकेला महसूस कर रही थी।
मैं कटी पतंग की तरह आकाश से गिरी और जमीन में अटक गई ,चाह कर भी आत्महत्या न कर सकी ।भैया भाभी की इज्जत का ख्याल आ जाता दिन तो किसी तरह घर के कामकाज में निकल जाता पर रात पियूष की याद में बहुत लंबी हो जाती । कहते कहते उसकी फोटो देखते हुए नीरा न जाने कहां खो गई।
तुम यह सब कैसे बर्दाश्त करती रही? ‘यहां तक के सफर का एक और न दर्दनाक सच है ,मंजू,,
नम आंखों से मंजू उसका चेहरा देखने लगी
‘हा मंजू ,,,भाभी का उपेक्षित व्यवहार और नीचा दिखाने से तंग आकर एक दिन में विधवा आश्रम के लिए निकल पड़ी। यहां सभी महिलाएं लूम पर कपड़ा बुनने का काम करती थी सोच कर तसल्ली हुई कि चलो यहां काम करेंगे और स्वाभिमान और शांति से रहेंगे।
यहां के मैनेजर की नजर मुझे कुछ ठीक नहीं लगती थी। वह किसी न किसी बहाने मुझसे बात करने की कोशिश करता ,एक दिन मैंने यह बात वहां की अपनी एक सखी सुचित्रा से कहीं तो वह हंसने लगी बोली –तू बड़ी भोली है चाहे हंसो रोओ ,उसकी नजर जिस पर आ जाती है वह किसी को नहीं छोड़ता ,मुसीबत की मारी सब अपना मुंह बंद कर घुटती रहती हैं। तुम इतना टेंशन मत लिया करो।
मुझे विश्वास नहीं हो रहा था यहां की महिलाएं यह अत्याचार सहकर चुप ओर नॉर्मल कैसे रहती हैं। मुझे लगा मैं आसमान से गिरकर खजूर में अटक गई हूं मैं डर के मारे सहमी सहमी सी रहने लगी और सोच लिया मैं इन सब के जैसी नहीं हो सकती।
अभी मुझे यहां आए तीन माह ही हुए थे एक दिन रात के खाने के बाद मैं अपने रूम का विस्तर ठीक कर रही थी तभी पता ही न चला वह मैं कमरे में कैसे आ गया और आते ही उसने दरवाजे की कुंडी लगा ली। अब मुझे बहुत-सावधानी से काम करना था मैंने एक लादी हुई मुस्कान से उसकी तरफ देखा और उससे कहा आप बैठिए मैं अभी बाथरूम से कपड़े बदल कर आती हूं। वह अपने गंदे इरादों के साथ पलंग पर बैठ गया। मैं बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद करके साड़ी के सहारे खिड़की से नीचे ग्राउंड पर आ गई ,भाग्य से गेट खुला था मैं वॉचमैन की नजर बचाकर आश्रम से बाहर निकल आई ।और ऑटो पकड़ कर थाने पहुंची रिपोर्ट लिखवाई और फिर यहीं आ गई भाभी के घर
भाभी बोली- लो लौट के बुद्धू घर को आए। यहां आने पर सभी बहुत खुश हुए मां ने सुना तो बहुत रोई बोली जैसा भी है यही रह सुरक्षित तो रहेगी।
‘और भाभी क्या बोली-‘
भाभी बोली-उसकी रिपोर्ट लिखवा कर तुमने बहुत अच्छा काम किया हमें पता चलता तो हम भी तुम्हें वहां से निकाल लेते ,आखिर वहां जाने की जरूरत ही क्या थी ?अब तो कामवाली बाई भी मैंने लगा ली है तुम्हें अधिक काम नहीं करना पड़ेगा । मैं समझ नहीं पा रही थी कि उन्हें वास्तव में मुझसे सहानुभूति थी या जरूरत।
भैया ने पुस्तके ला दी थी तो मैंने इस साल घर बैठे एम ए. भी इस साल कर लिया
यह तो तुमने अच्छा किया पर इतने कम समय में तुमने कितनी मुश्किलों का सामना किया मैं तो सोच कर हैरान हूं
अरे,,, भाभी आ गई ,,कहते हुए दौड़ कर नीरा किचिन की तरफ भागी
तभी भाभी की आवाज मंजू से टकराती हुई नीरा तक पहुंची

नीरा कहां हो ,,,चाय बना कर नहीं रखी?
‘ बस भाभी अभी ला रही हूं
बच्चों का होमवर्क करा दिया था या सब मेरे लिए रखा है??
बस करवा ही रहीं हूं भाभी ,
मुझे स्थिति समझते देर न लगी ,
नीरा तो भूल ही गई थी कि मैं बैठी हूं
मुझे वहां से आना ही उचित लगा। सुबह चाय पीते पीते मैंने मां बाबूजी और छोटे भाई तनुज को मंजू ने नीरा की पूरी कहानी सुना दी ।
“उसकी अभी उम्र ही क्या है इतनी सुंदर सुशील शालीन समझदार और पढ़ी लिखी लड़की की किसी अच्छे लड़के से शादी कर देना चाहिए मां बोली ।
हां मां आप ठीक कह रही है पर लगता है यह काम भी मुझे ही करना पड़ेगा। अरे, पहले यह फोटो तो देख ले यह तनुज के रिश्ते के लिए आई है
‘यह लड़की तो अच्छी है पर उसे दिखाओ जिसे करना है । फोटो तनुज की तरफ कर दी।

तनुज फोटो बिना देखे ही वहां से उठ कर चला गया
मंजू बोली -ऐसा क्या हो गया है जो यह उठ कर चला गया
मां बोली -कहीं इसने कोई दूसरी लड़की तो नहीं पसंद कर ली तुम पूछो lमंजू ने तनुज के पास जाकर पूछा तो वह बोला -मुझे तो नीरा पहले भी बहुत पसंद थी यदि वह मेरे साथ शादी करने तैयार हो जाए तो यह मेरा सौभाग्य होगा।
वाह ,तुमने तो मेरी प्रॉब्लम ही साल्व कर दी, उसे मनाना तो मेरा काम है।
पिताजी ने सुना तो मां से बोले –देखो यह हमारे ही संस्कार हैं ,देख रही हो उन क्यारियां में हमने जो बीज थे उनमें नए अंकुर निकल आए हैं
मां मुस्कुरा उठी ।
कुछ समय लगा पर नीरा की शादी मैंने तनुज से करवा दी। विदा के समय नीरा की मां रो पड़ी बोली –बेटी आज तूने मेरा बहुत बड़ा बोझ हल्का कर दिया ईश्वर तुझ जैसी बेटी सबको दे।
कहानीकार
मीना गोदरे ,अवनि
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