# Kahani Pratiyogita 18 by Surendra Kumar Arora

भाई

‘ क्या आपके बड़े भाई ने आपको दो लाख रूपये दिए थे ? ‘
‘ जी दिए थे ! ‘
‘ कब दिए थे और क्यों दिए थे ? ‘
‘ जी 12 साल पहले दिए थे क्योंकि मेरा काम धंधा अच्छा नही चल रहा था तो मेरे आग्रह पर बड़े भाई ने छोटे भाई की मद्दत की थी।’
‘पर कागजों में तो आपका कहना है कि आपने इनसे मकान का किराया लिया था ।’
‘ जी ! वो बात तो है ही क्योंकि ये हमारे पुश्तैनी मकान का इस्तेमाल कर रहे हैं ? ‘
‘ दोनों बातें तो एक साथ सच नहीं हो सकती !’
‘ जी दोनों ही बातें ठीक हैं ।’
‘ वो कैसे ? ‘
‘ जी एक बात मेरे हिसाब से और दूसरी मेरे वकील साहब की सलाह से !’
‘ आपके हिसाब से दस साल पहले भाई ने भाई की मद्दत की ।’
‘ जी ! ‘
‘ तो अब भाई तो वही है , इस बार आप नरम पड़ जाइये , मामला तो अब भी भाई का ही है ।’
‘ मैं क्यों नरम पडू , मैं इनको नहीं छोड़ सकता । इन्होंने मेरी माँ , जो इनकी भी थी को उनके बुढ़ापे में बहुत प्रताड़ित किया ।चाहे कुछ हो जाये , मैं इन्हें सबक सिखा कर रहूंगा ।मैं अपनी पुश्तैनी जायदाद भी इनसे लेकर रहूंगा ।’
‘ उसके एवज में तो आप दो लाख रूपये ले चुके हैं । एक बात और भी स्पष्ट कर दें तो अच्छा होगा कि जो भाई जरूरत के वक्त आपकी मद्दत कर सकता है , वो व्यक्ति अपनी बुजुर्ग मां को प्रताड़ित भी कर सकता है क्या ? ‘
‘ वो सब मुझे कुछ नहीं मालूम पर मेरी माँ वाली बात मैं नही छोड़ सकता । ‘
‘ क्या आपकी माँ इनके साथ रहती थीं ? ‘
‘ जी , उसी मकान में रहती थीं । ‘
‘ तो जब वे प्रताड़ित हो रहीं थी तब आप माँ को अपने पास ले जा सकते थे , बड़े भाई के पास ही क्यों रहने दिया ? ‘
‘ जी , इच्छा तो थी पर मेरे भी तो बीबी -बच्चे थे । मैंने उनको भी तो संभालना था फिर माँ का दिल अपने ही घर में लगता था । ‘
‘ वैसे वो मकान बनवाया किसने था । आपके भाई का कहना है कि मकान उन्होंने बनवाया था ? ‘
‘ ये क्या बात हुई , मकान तो असल में मजदूर बनाते हैं तो क्या मकान उनका हो जाता है ।उस मकान में मेरी माँ हिस्सेदार थी क्या यही काफी नहीं है ? उस नाते मेरा हिस्सा तो हो ही गया ।’
‘ चलिए कुछ तो सच उगला आपने ! हमने मसला समझ लिया है । निर्णय आ जायेगा । आप फैसले की कापी एक हफ्ते बाद ले लीजियेगा । अब आप जा सकते हैं ।’

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

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