#Kahani Pratiyogita18 by Kavi R C Verma

बटवारा  – कहानी-

 

रोड पर खड़े एक बृद्ध ब्यक्ति ने लिफ्ट मांगी

मैंने मोटरसाइकल को रोका पूछा बाबा कहा जाओगे ।

बृद्ध बोला उड़ीसा।

मैंने बिठाया तो वो ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे मैंने गाड़ी को संभालते हुये हाथ का सहारा लगाया फिर बैठ गये।

उन्होंने कुछ बोला मैं ठीक से समझ नहीं पाया क्योकि चलती गाड़ी में आवाज कम सुनाई दे रही थी।

तब एक गांव मिला बस्ती में स्कूल था उसके सामने ब्रेकर था मैंने गाड़ी रोकी। बाबा ने कुछ कहा मैने सुना । शायद बाबा ने पता पूछा ।

मैने अपना पता बताया फिर करते हो पूछा मैंने कहा स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करता हूँ।

बाबा ने कहा बेटा एक बात बोलूं?

बाबा के चेहरे से भोलापन,झलक रहा था।

मैंने कहा बताओ बाबा ।

बोला बेटा दस रुपया हमें दे देना। नास्ता कर लूंगा ।

मैं समझ गया शायद बाबा भूखा है।

पास के होटल पर बाबा को बुलाया और कहा बाबा नास्ता कर लो। वो तुरन्त बैठ गये।

नास्ता किया फिर मोटर साईकिल पर बिठाया और चल पड़े।

तभी बाबा ने आप बीती कहानी सुनाई । बोले हमारे दो लड़के हैं एक लड़की है। लड़की को अच्छे खाते पीते घर में शादी की है वो सुखी ।

दौनों लड़कों की शादी कर दी है उनके दो दो बच्चे भी हैं।

कुछ दिन ठीक ठाक बीते फिर दौनों बहुओं के बीच अक्सर कहा सुनी होती रहती थी।

बात न बड़े इसलिए उनको अपनी समझदारी से अलग अलग ब्यबस्था कर दी।

दौनों भाइयों ने तय किया कि पिता जी को पन्द्रह-पन्द्रह दिन मैं खिलायेंगे ।

अब मैं दौनों के घर पन्द्रह -पन्द्रह दिन खाता हूं। जिस दिन महीना इकतीस दिन का होता है उस दिन मुझे उपवास रखना पड़ता है। क्योंकि ये दिन किसी के हिस्से में नहीं आता । भगवान के भरोसे चुपचाप सो जाता हूँ। आज भी बेटा मेरा इकतीस वाँ दिन है। मेरे आंसू निकल गये ।

मित्रो ऐसा बंटवारा मत करना।

 

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