#Kahani by Preeti Praveen Khare

कहानी-” हौसलों की उड़ान ”

आज सरिता को पुरानी एक एक बात याद आ रही थी।कभी वो उन बातों को याद करके खट्टे-मीठे अहसासों में खो जाती तो कभी आज की जद्दोजहद वाली भीड़ में।

ऐसा लगता है जैसे कल ही की तो बात है,जब एक बेटी पीहर से विदा होकर इस गाँव में आई थी। लम्बा सा घूँघट काढ़े सकुचाती शर्माती सी बैलगाड़ी में बैठकर इस गाँव में बहू बन आई थी।

उसका पति राजेश गाँव का एक बहुत ही ज़िम्मेदार और समझदार नागरिक था।उसके गाँव में अधिकतर लोग खेती किसानी किया करते थे।वह भी खेती किसानी को अपने माँ बाप का आशिर्वाद मानता था। राजेश अपनी पत्नि सरिता के साथ बहुत ख़ुश था।मिट्टी की सोंधि ख़ुश्बू,कुएँ से पानी खींचना लिपाई-पुताई के काम में सरिता को बहुत आनंद आता था।कठोर परिश्रम सरल स्वभाव,सहयोग की भावना और उदार ह्रदय राजेश की विशेषता थी।

सरिता ज़्यादा पढ़ी लिखी तो थी नहीं,लेकिन घर के सभी कामों में पारंगत थी।पौ फटने से पहले  वह उठ जाया करती थी।झाड़ू बुहार कर चिड़ियों को दाना पानी देना उसकी पहली प्राथमिकता थी।कभी कभार थोड़ी देर हो जाती तो चिड़ियाँ उसे चीं चीं चूँ चूँ करके जगा ही देती थीं।अपनी भाषा में मानो वो सरिता से दाना पानी माँगती।सरिता भी उनकी बातें समझती और उनके सवालों के उत्तर दिया करती।कई बार राजेश चिड़ियों से बातें करते देख उसे बावरी समझकर हँसता भी था।

राजेश खेती किसानी के अलावा बाहर के सभी कामों को सुचारू रूप से करता तो सरिता घर के।उनका परिवार एक सुखी परिवार की मिसाल बनता जा रहा था।उन दोनों का आपसी तालमेल देख कई बार गाँव के लोग अचरज में पड़ जाते थे,और कुछ तो उनके ख़ुशहाल जीवन से ईर्ष्या भी करते थे।

दोनों अपने में इतने मस्त थे कि दिन महीने साल हवा की गति से गुज़रते जा रहे थे।एक दिन राजेश की दूर की रिश्ते की बहन आई।उसके साथ उसकी साँवली सलोनी सी,तीन साल की बच्ची भी थी।वह अपनी तोतली ज़ुबान से जब राजेश को मामा कहती तो उसके शब्द कान में मिश्री घोल देते।नन्हीं मुन्नी,चुलबुली सी काँची ने दो दिन में ही सरिता का दिल जीत लिया।उसकी बाल सुलभ क्रियाओं पे सरिता अपना दिल हार बैठी थी।इन दो दिनों में समय कैसे बीता उसे पता ही नहीं चला।जाने से पहले सरिता ने उसे सीने से लगा ख़ूब प्यार और दुलार किया।जाते-जाते ननद जीजी ने सरिता को उसके आँगन में किलकारी गूँजने का भरपूर आशिर्वाद भी दिया।

अब तो सरिता भी नन्हें मेहमान की किलकारी कि आतुरता से प्रतीक्षा करने लगी।इंतज़ार की घड़ियाँ लम्बी होने लगीं।अब उसके परिवार में ख़ुशी की चमक थोड़ी फीकी पड़ने लगी।धीरे-धीरे सुख,शांति और समृद्धि पर भी दुःख के काले बादल गहराने लगे।

सरिता रोज आँचल फैलाकर ईश्वर से मनुहार करती।गाँव के सभी मंदिरों में मन्नतें और ढोक देती।सुशीला काकी के बताए अनुसार उसने गाँव के प्राचीन बड़वाले महादेव मंदिर में”मानता”भी माँग लिया।

अब तो शादी के ग्यारह वर्ष भी बीत गए।कहीं से कोई उम्मीद की किरण भी दिखाई नहीं दे रही थी।कल तक जो,गाँव के बड़े बुज़ुर्ग तथा अड़ोसी-पड़ोसी सरिता पर नेह लुटाते थे,वे आज उसे उलाहना देने से नहीं चूकते।आए दिन राजेश को भी टोके बिना लोगों का खाना नहीं पचता।

राजेश आशावादी और सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति था।वह भाग्य और भगवान दोनों को मानता था।इन दिनों भी उसका विश्वास अंगद के पैर की तरह अटल था।हाँ!सरिता ज़रूर दिनोंदिन हताश होती जा रही थी।आजकल चिड़ियों से बात करना भी उसने कम कर दिया था।कभी-कभी तो वह दाना पानी रखना भी भूल जाती थी।एक दिन चूल्हे पर दूध रखकर वह भूल गई।सारे घर में धुआँ फैल गया,जलने की बदबू आने पर पड़ोस की कमला काकी ने आकर उसे हिलाया तब उसे होश आया।वह निराशा के दलदल में घुसती चली जा रही थी।अब तो इस तरह की घटनाओं ने राजेश के घर में डेरा सा जमा लिया था।इन सबके बावजूद राजेश ने धैर्य और संयम का दामन नहीं छोड़ा।वह सरिता को भी संबल देता था।

अंततःसरिता की निराशा हार गई,और राजेश का विश्वास जीत गया।बीजाअंकुरण के साथ सरिता की उदासी उड़न छू हुई।सरिता के आँगन में अब फिर से चिड़ियाँ चहकने लगीं।मानों नई कोंपले फूटने का संकेत दे रहीं थीं।सरिता ख़ुद भी इस बदलाव से अचम्भित थी।पूरे बारह साल बाद घर के आँगन में जो वीराना सा आम का पेड़ था,उस पर झूलने वाले की कल्पना में वह खो गई।राजेश ने भी सरिता को कई दिनों बाद इतना ख़ुश देखा तो उसका ईश्वर पर विश्वास और प्रगाढ़ हो गया।

अस्पताल जाते समय सभी उम्मीद भरी निगाहों से सरिता को मन ही मन फूलो फलो का आशिर्वाद देने में परहेज़ नहीं कर रहे थे।अपने प्रति लोगों का सकारात्मक रवैया देख वह भी मन ही मन परमेश्वरी को धन्यवाद देते हुए आने वाले बच्चे के सुखद भविष्य के ताने बाने बुनने लगी।

अब उसकी गोदी में भी काँची की ही जैसी एक गुड़िया थी।क़ुदरत के इस उपहार को पाकर वह आज अपने आप को धन्य मान रही थी।आज उसे राजेश के विश्वास पर दृढ़ विश्वास हो गया था।

चमचमाते काले घुँघराले बाल,तीखे नैन नक़्श और गाय के दूध जैसी गोरी रूपवान गुड़िया किसी परी से कम नहीं थी।सरिता कभी नन्हीं परी को निहारती तो कभी अपने आप को।गोदी में बिटिया को देख वह अपनी सारी प्रसव पीड़ा भी भूल गई थी।

नाऊ चाचा पूरे गाँव में बिटिया के नामकरण के भोज का निमंत्रण तथा सोहर गाने के लिए लोगों को बुलव्वा देते फूले नहीं समा रहे थे।ताज़े गोबर से लीप कर ढिग लगाने के बाद घर के चारों ओर बंदनवार सजाकर राजेश बार-बार बिटिया को निहारते नहीं थक रहा था।ढोल,मंजीरा और लोटे पे चम्मच बजातीं कमला चाची अनगिनत बार बिटिया की बलाएँ लेती जा रही थीं।बिटिया अब गौरी कहलाने लगी।वक़्त गुज़रता गया,लेकिन हर दिन गौरी के जन्म का उत्सव मनाने का कोई ना कोई बहाना राजेश अवश्य ही ढूँढ लिया करता था।

धीरे-धीरे गौरी ने पलटना और घिसटना शुरू कर दिया।अब तो सरिता की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था।समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था।अब गौरी घुटने चलते हुए खड़े होने की कोशिश करने लगी।शुरू-शुरू में अन्य बच्चों की ही भाँति वह भी गिर जाती थी।थोड़ी ही देर बाद फिर से प्रयास करती थी।

चोट लगने पर सरिता घरेलू उपचार के द्वारा उसे ठीक कर लेती थी।गौरी की हर समस्या का समाधान सरिता के पास तुरंत उपलब्ध था।

गौरी की छोटी-मोटी बीमारी का इलाज स्वयं करने के कारण सरिता सबकी चर्चा और प्रसन्नता भी पाने लगी।अब तो गाँव की महिलाएँ भी घरेलू नुस्ख़े जानने के लिए सरिता के घर के चक्कर लगाने लगीं।दूसरे बच्चों की बीमारी को स्वयं के उपचार से ठीक होते देख सरिता ख़ुद पर आश्चर्य करती थी।उस पर राजेश की सेवाभावना का भी पूरा असर था।अब तो पति-पत्नि दोनों की ही सेवाभावना का ढिंढोरा पिटने लगा।

एक दिन गौरी बैलगाड़ी से गिर गई।गिरने से उसके दायें पैर में सूजन आ गई।सरिता ने घरेलू उपचार शुरू कर दिया।वह सुबह शाम हल्दी चूने का लेप लगाकर सूती कपड़े की पट्टी से उसका पैर बाँध देती।दोपहर में सिंकाई करती,फिर शाम को सरसों के तेल से मालिश करती।एक सप्ताह बाद गौरी को आराम होना शुरू होने लगा।दूसरे सप्ताह तो वह धीरे-धीरे चलने लगी।अब तो सरिता के पास आस-पास के लोग भी उपचार के लिए आने लगे।

गौरी अब दस बरस की हो गई।मीना,गीता और शीला से उसकी सहेलियाँ बन गईं।नित नए-नए खेल भी खेलने लगी।एक दिन गिप्पा खेलते समय वह गिर गई,और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।मीना,गीता और शीला ने मिलकर उठाने को कोशिश की लेकिन वह खड़ी नहीं हो पा रही थी।सरिता के घरेलू नुस्ख़े भी फ़ेल हो गए।गौरी असहनीय पीड़ा के कारण सारा दिन रोटी चिल्लाती रहती।

जैसे ही ये बात सुशीला काकी को पता चला वह तुरंत भागी-भागी सरिता के घर पहुँची।उन्होंने बड़वाले महादेव की “मानता” वाली बात को याद दिलाया।पाँच साल तक “मानता” पूरा नहीं कर पाने के कारण गौरी की ये दशा हुई।अब तो महादेव का ग़ुस्सा शांत होना मुश्किल है।सुशीला काकी ने यह भी बताया की अब गौरी पहले की तरह कभी नहीं चल सकेगी।सरिता को अपराधबोध में देख राजेश ने बहुत समझाया।लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थी।दूसरी तरफ़ गौरी को बिस्तर पर पड़े देख वह अपने आप को माफ नहीं कर पा रही थी।

इसी बीच गाँव में स्वास्थ्य परीक्षण का शिविर लगा।सरिता डाक्टरों को नहीं दिखाना चाहती थी,क्योंकि सुशीला काकी ने उसे महादेव का प्रकोप बताकर डरा जो रखा था।राजेश ने सरिता की एक ना सुनी और गौरी को स्वास्थ्य परीक्षण करवाने ले गया।डॉक्टरों ने निरीक्षण कर बताया कि गौरी का एक आपरेशन होगा,उसके बाद वह सामान्य बच्चों की तरह चल सकेगी।

राजेश ने ख़ुशी-ख़ुशी ये बात सरिता को भी बताई।सरिता अभी भी राजेश की बात पर विश्वास नहीं कर पा रही थी।सुशीला काकी ने भगवान का क़हर गौरी पर फिर से फूटेगा कहकर आपरेशन का विरोध किया।

राजेश ने सबकी बात को अनसुना कर दिया।नियत समय पर गौरी का आपरेशन हुआ।दो सप्ताह बाद वाकर के सहारे उसे चलाया गया।धीरे-धीरे वह सामान्य बच्चों की तरह चलने लगी।गौरी अपनी सहेलियों के साथ खेलने जाने लगी।उसे यूँ दौड़ता देख सरिता बहुत ख़ुश थी।

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डॉ.प्रीति प्रवीण खरे

भोपाल म.प्र

सम्पर्क-९४२५०१४७१९

 

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