#Kahani by Rameshwari Bartwal Nadan

अनकहा सा

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गुनगुन बचपन से अपने अपने चाचा की लाडली थी.घर में तीन बच्चों में गुनगुन सबसे छोटी थी.गीतिका जब ये प्यार देखती तो सोचती कि देवर की कोई संतान नहीं है .इसलिए गुनगुन के प्रति उनका झुकाव ज्यादा है . दिन-भर चाचा की गोद में बैठी रहती गुनगुन .उसे इंतजार रहता चाचा के ओफिस से आने का .

इसी तरह साल दर साल बीतते रहे.गुनगुन स्कूल जाने लगी .शाम को चाचा के पास पढने बैठ जाती थी .जाने क्युँ कुछ दिनों से गुनगुन को चाचा की गोद में बैठना अच्छा नहीं लगता था.उनकी पकड उसे जकडन लगने लगती .मात्र सात साल की गुनगुन को अब चाचा की गोद नहीं सुहाती थी.उनका उसे छूना जाने क्युँ अच्छा नहीं लगता . मासूम गुनगुन की समझ में कुछ नहीं आ रहा था.चाचा एक हाथ में चोकलेट लेकर उसे अपने पास बुलाते फ़िर गोद में बैठाकर खिलाते .दूसरे हाथ से उसके पूरे शरीर को सहलाते .

एक दिन गीतिका की नजर गोद में बैठी गुनगुन पर जा पडी जो खुद को चाचा से छूडाने का असफल प्रयास कर रही थी.चाचा उसे प्यारी गुडिया कहकर प्यार से गोद में बिठाने की पूरी कोशिश कर रहे थे.गीतिका ने देखा तो उसे महसुस हुआ कि गुनगुन जैसे चीखना चाहती हो मुझे छोडो पर चीख नहीं पा रही है .

पल भर में ही गुनगुन को देवर की गोद में से खिचंती हूई बोली बस इतना ही प्यार कीजिए बच्ची को .गीतिका की गुस्से से लाल हूई आँखों ने वो अनकहा सच कह दिया जिसे मासूम गुनगुन नहीं समझ पा रही थी .अब न चाचा गोद में बिठाते थे न गुनगुन को इंतजार रहता चोकलेट खाने का .अनकहा सच सबके सामने खडा था एक सवाल बनकर किस पर यकीन करे ?

 

रामेश्वरी नादान

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