#Kahani by Ramji Prasad Bhairav

  पागल (2)
सामने बहू बेटे को देखकर भोला बाबू ने अनभिज्ञता जाहिर की, और पूछा ” आप लोग कौन हैं ।”
तभी बड़ी बहू सुनीता ने अपने पति विनोद से कहा -” मैं ना कहती थी , पापा का दिमाग़ ख़राब हो गया है ।”
विनोद ने सुनीता का हाथ दबाया , फिर पिता की ओर मुख़ातिब होकर बोला -” पापा मैं हूँ , आप का बड़ा बेटा विनोद और ये है आप की बहू सुनीता । ये छोटा रमेश और उसकी पत्नी , कैसे नहीं पहचानते आप हम लोगों को।”
भोला बाबू ने निस्पृह भाव से सभी को पुनः देखा , फिर बोले -” नहीं नहीं आप लोग शायद गलत पते पर आ गए हैं । मैं आप का पापा नहीं हूँ ।”
यह सुनकर छोटी बहू बोल पड़ी -” पापा को पागलख़ाने भर्ती कराना पड़ेगा ।इनकी दिमाग़ी हालत ठीक नहीं है । अन्यथा कोई अपने बेटे बहू को नहीं पहचानता ।”
“तुम सही कह रही हो सविता , मुझे भी ऐसा ही लगता है ।” सुनीता ने कहा
“पापा क्या हो गया आप को ,कितना प्यार करते थे आप हमें , पढ़ा लिखा कर विदेश में नौकरी के योग्य बनाया। आप की यह दशा हमसे देखी नहीं जाती ।” कहकर विनोद फफक पड़ा ।
रमेश भी रोते हुए बोला -” हाँ पापा ,हम यहाँ की सारी संपत्ति बेचकर , आप को विदेश ले जाएंगे , वहीं आप का अच्छे से इलाज़ कराएंगे ।”
भोला बाबू को हँसी आ गयी । वो ठहाका मार कर हँस पड़े । बहू बेटे भौचक खड़े रहे । उनको पूर्ण विश्वास हो गया कि  सचमुच पापा की दिमागी हालत ठीक नहीं है ।
“तुम्हें अपनी मां याद है , या केवल यह पागल बाप ही याद है ।” भोला बाबू के इस प्रश्न पर सभी निरुत्तर हो गए । और सिर झुका लिया ।
भोला बाबू दीवार पर टँगी पत्नी के तस्वीर के पास गए ।और बोले -” जब यह बीमार थी , बहू बेटों को देखने के लिए तड़प रही थी । तब तुम लोग कहाँ थे । जब जब मैंने तुम दोनों को फोन किया , रांग नम्बर कहकर फोन काट दिया ।एक बार तुम दोनों से मेरी बात भी  हुई थी , तुम दोनों ने अपने अपने कामो की व्यस्तता का रोना रोया , और बीमार मां को देखने नहीं आये ।
इस दौरान मैं कहाँ और किस हालत में हूँ । यह भी जानने की जहमत नहीं उठाया ।फिर अचानक से यह बूढ़ा और पागल बाप कैसे याद गया ।”
सभी चुप थे , किसी के पास कोई उत्तर नहीं था ।भोला बाबू ने आगे कहा -” तुम लोग यहाँ इसलिए नहीं आये हो कि यह बूढ़ा तुम्हारा बाप लगता है । बल्कि इसलिए आये हो कि तुम्हे पता चल चुका है , मैं सारी सम्पत्ति तुम लोगों को न देकर , अपने भतीजे शुरेश के नाम करने वाला हूँ । यह गरीबी में जिया मग़र हमसे कोई अपेक्षा नहीं किया । अब इस बुढ़ापे का यही सहारा है । जब तिल तिल करती मां से , तुम लोगों ने रिश्ता नहीं रखा , तो अब बाप से रखने का कोई औचित्य नहीं है । तुम लोग चले जाओ अपनी दुनियां में । मैं यहाँ सुखी हूँ और हाँ … मैं पागल नहीं हूँ । एक एक को पहचान सकता हूँ । तुम्हारे स्वार्थी व्यवहार को , जो तुमने जमाने से सीखा है ।”
 इतना कहकर भोला बाबू उठकर घर के अंदर चले गए और दरवाजा बंद कर लिया ।
            रामजी प्रसाद ” भैरव “
चहनियां . चन्दौली
 9415979773

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