# Kahani by Ramji Prasad Bhairav

बोझ

“मैं दोनों बहुओं को एक साथ नहीं रख सकती , छोटा सा घर है , कितनी दिक्कत होती है ।” जानकी देवी ने मुखर होकर कहा तो दोनों बहुएं सहम उठी , जाने किसका निर्वासन हो । परन्तु मर्यादा के कारण मुँह खोलने की हिम्मत नहीं हुई ।
” तुम्हें दिक्कत क्या है , अगर दोनों बहुएं मिलजुल कर साथ रहें ।” महेंद्र बाबू ने पत्नी से पूछा ।
” क्या तुम नहीं जानते पेंशन के पैसे से घर चलता है ।दो जवान लड़के घर में बैठ कर मुफ़्त की रोटी तोड़ते हैं । कमाने धमाने की चिंता हुई आज तक । दो दो बच्चों के बाप बन गये हैं , कब सूझेगी ।”
“अरे छोड़ो भी , कैसी बात करने लगी । इन्हीं सबों से तो परिवार है ।” महेंद्र बाबू ने समझाया ।
“ये बहुएं हर साल पेट फुला लेती हैं। कैसे सहेगा कोई इनका बोझ , अब पाँव चादर से बाहर हो रहा है ।मेरी बात मानों छोटी को मायके भेज देते हैं । उसका अंतिम महीना है , जाने कब …..। इस छोटे से घर में मुझसे नहीं सपरेगा ई सब ।
महेंद्र बाबू हँसते हुए बोले -” अरी पगली , घर बड़ा होने से कुछ नहीं होता , आदमी का दिल बड़ा होना चाहिए दिल । मैं ऐसी स्थिति में बहु को मायके जाने की इजाज़त, बिल्कुल नहीं दूँगा ।जो दुःख – सुख आएगा । हम साथ मिलकर सहेंगे ।”
देर से ही सही जानकी देवी सहमत हो गयीं ।उन्हें अपनी भूल का एहसास हो चुका था ।

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