#Kahani By Ravirashmi ‘anubhooti’

 वैसी ही मृत्यु
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        प्रकृति के बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता कि यह किधर पासा पलट दे ।देखा जाए तो , प्रकृति या यूँ कहा जाए कि  भगवान न्याय ही करता है , और ऐसा न्याय करता है कि दाँतों तले उँगली दबा लेनी पड़ती है ।
         कामिनी दी कुछ महीनों से बीमार चल रही थीं । वह गिर गई थीं  , पैर पर चोट लग गयी थी, लँगड़ाकर भी चलना नहीं हो रहा । भाई को फोन किया था , अपनी अस्वस्थता के बारे में बताने के लिए । भाभी ने भी सुना , मन में दया उपजी , पैसे भेजने की बात सोची भी , पर तुरन्त विचार आया कि भेजे गये पैसे दी को तो मिलने वाले ही नहीं हैं , और पति से कह दिया कि दी तो पैसे मँगवाने के लिए बहाने ही ढूँढ़ती हैं । क्या मालूम वह गिरी भी या नहीं , उनका पैर फ़्रैक्चर हुआ भी है या नहीं ? पचास हज़ार तो दे चुके हो , अपना ही मकान खाली करवाने के ,  कम हैं क्या ?  किस तरह अकड़ दिखाई थी , हमारे ही घर पर कब्ज़ा करके ! घर अलग टूट गया , मरम्मत नहीं करवायी । सोलह वर्ष हो गये रहते हुये , मकान खाली करने को तैयार नहीं थीं ।
        उसे याद आया , उस घर में अपने सीधे – सादे माता – पिता तुल्य पूज्य सास – ससुर , पति व अपनी मासूम बच्चियों के साथ बिताया समय , उसी घर में अपने सास- ससुर की सेवा , उनका उसे बेटी जैसी मानना , बड़े स्नेह – प्यार व इज़्ज़त से उनका उसके साथ व्यवहार करना । उसका मन भर आया । पर , अविरल आँसुओं को मन संयमित कर उसने विराम दिया ।
          पति बोले कि मुझे पैसा तो भेज ही देना चाहिए । उस समय भी उनको कपड़े व कम्बल आदि भिजवा दिये तो , अच्छा ही हुआ था । सुनकर वह चुप ही रही , पर अनगिनत विचार हृदय – पटल पर उमड़ते – घुमड़ते रहे । उसके बाद तो कुछ – कुछ समय के अंतराल पर उनकी बीमारी की ख़बर मिलती रही कि उनका बिस्तर से उठना ही मुश्किल हो रहा है ।
        समय शायद नज़दीक आ रहा है । फोन करने पर दी ने रुक रुककर कर थोड़ी देर बात की । मन धूप में रखी बर्फ़ की तरह पिघल रहा था । बावज़ूद इसके उसे याद आने लगे वे क्षण , जब ससुर की मृत्यु के पश्चात् अपने पास रहती सास की जाँघ की हड्डी टूटने के बाद उसका  ऑपरेशन हुआ था , और कुछ विपरीत परिस्थितियों के वशीभूत सास को गाँव में  अपने ही घर में कामिनी दी की निगरानी में  उनकी देखभाल हेतु छोड़ना पड़ा, और चाबी दी को देनी पड़ी ।
        चाबी मिलते ही दी का मन बल्लियों उछलने लगा था । अब तो उन्हीं का राज था उस घर में । उन्हें ख़बर मिलती रही थी कि दी अपनी ही लाचार माँ की सेवा ठीक से नहीं  करती हैं , और घर में ताला लगाकर काम पर चली जाती हैं । माँ पुकारती रहती हैं, पर सुनने के लिए वहाँ कोई न होता । कितनी लाचारी थी कि एक कर्मठ माँ की यह हालत थी कि वह चल -फिर नहीं सकती थीं और न ही खड़ी हो सकती थीं ।
        दी को दिए पचास हज़ार रुपयों पर दी का कोई हक़ नहीं रह गया था । पंद्रह हज़ार उनके आवारा बेटे ने , और पैंतीस हज़ार उनकी तीसरी बेटी ने ले लिए थे । दी तो फिर से ठन – ठन गोपाल । इलाज के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं थी उनके पास । जैसे – तैसे थोड़ा- बहुत इलाज हो रहा था । उस दी के लिए पैसे भेज दिए गये थे , जिस दी ने घर पर कब्ज़ा करने के लिए वकील से घर पर हक़ जमाने के लिए नोटिस भिजवाये थे , जिस दी ने छोटे भाई के साथ रिश्ते की कद्र तक नहीं की थी , जिस दी की ननंद के रूप में पल – पल इज़्ज़त की गयी थी । क्या ऐसे होते हैं रिश्ते , कि अपने बच्चों के कहने पर मात्र दस महीनों की माँ की सेवा व देखभाल के बदले बड़ा मकान चाहिए था उन्हें। काश ! कोई उन्हें समझाने वाला कोई होता ।
        ओह ! अफ़सोस ! 4 अप्रैल , 2017 का वह दिन , वह मनहूस दिन , जो दी को वैसी ही मृत्यु दे गया था , जैसी मृत्यु उनकी देखभाल के साये तले उनकी माँ को 14 नवंबर , 2001 को दे गया था ।
        इनसान सभी भौतिक चीज़ें इसी धरा पर छोड़ जाता है , फिर न जाने क्यों वह लोभवश दूसरों को कष्ट देने वाले कारनामे कर जाता है । दी अपने अंतिम समय में माँगी हुयी राशि का उपभोग भी नहीं कर पायीं । तीन बेटों में  से कोई भी बेटा उन्हें अपने पास रखने को तैयार नहीं था । यही इनसान की नियति है , ये ही उसकी ज़िंदगी के चक्कर हैं ।
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रवि रश्मि ‘ अनुभूति ‘
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