#Kahani by Reeta Jaihind Arora

पुजारी

एक मंदिर में एक पुजारी बहुत समय से भगवा वस्त्र धारण कर भक्त व भगवान की सेवा करता था । और हर आने जाने वाले भक्तों से रामराम बेटा राधे राधे कर सभी का चित्त प्रसन्न कर देता था ।उस पुजारी के स्नेह से भक्त भी बहुत आने लगे और मंदिर में प्रसाद भी पंडित जी सबको खुश होकर बांटते थे।चढावा भी अच्छा होने लगा।जितना भी चढ़ावा  आता सब मंदिर के बनाने में लग जाता था ।   पंडित जी की अथक मेहनत से और ठाकुर जी की अनुकंपा से भव्य मंदिर बन गया । एक भक्त भी मंदिर में रोजाना प्रभु दर्शन को आता था । और पंडित जी को रामराम करके और प्रसाद  माँगकर खाता था ।पंडित जी जितना भी अधिक प्रसाद देते और ये कहकर बस इत्ता सा ये लो अपना प्रसाद वापिस और छोड़कर चला जाता था ।ऐसा करना रोजाना का क्रम बन गया था ।एक दिन पुजारी जी से किसी ने कहा कि रोजाना ये आपका प्रसाद वापस कर जाता है आप इन्हें कह दिया करो कि बेटा प्रसाद तो खत्म हो गया कल ले लेना दो तीन दफा ऐसा करने से अपने आप नहीं मांगेगा।पंडित जी बहुत ज्ञानवान और वेदज्ञान के मर्मज्ञ और बहुत संस्कृत के महाज्ञानवान पंडित थे ।उन्होंने कहा कि तुमहे नहीं मालूम वो क्यों प्रसाद ग्रहण कर वापस करते हैं वो देखते हैं कि प्रसाद तो पंडित जी सारा बाँटने में खत्म कर देते हैं और अपने लिए नहीं बचाते वो अपने हिस्से का प्रसाद भी मुझे खिलाने के उद्देश्य से लौटा देते हैं । मैं जानता हूँ ।

– रीता जयहिंद अरोड़ा

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