#Kahani by Rifat shaheen

शीर्षक:-मूक संवाद और वासना

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कल शाम ऑफिस से लौटने में काफ़ी लेट हो गई थी ।घर और ऑफिस की दूरी भी लगभग 30 किमी है।तीन बार टैक्सी बदलनी पड़ती है। मुझे स्कूटी फोबिया है,कार ड्राइव करनी नही आती,बस और मेट्रो की भीड़ में दम घुटता है,विकल्प है तो केवल टैक्सी।चौक तक तो आराम से टैक्सी मिल गई पर चौक पहुंचते पहुंचते ,रात के 12 बज गए थे …चारो ओर एक अजीब सा रहस्यमयी सन्नाटा पसरा था …न कोई टैक्सी ,न रिक्शा ,बस इक्का दुक्का बाइक या साइकिल सवार सर से भागे चले जा रहे थे ।में फुटपाथ के एक तरफ खड़ी हो कर सोचने लगी …क्या करूँ? घर फोन करके पति को गाड़ी लेकर आने को कहूँ या फिर किसी से लिफ्ट लूं? पर लिफ़्ट भी ख़तरे से ख़ाली नही । मुझे नानी,दादी की वो बात याद आ गई …स्त्री रत्न भंडार है ,और पुरुष लुटेरा ….नही नही लिफ़्ट नही मुझे झुरझुरी सी अस गई

और में पति का नम्बर मिलने लगी। तभी एक दृश्य ने मेरे लेखक मन को अपनी ओर आकृष्ट किया। फुटपाथ पर एक अधेड़ भिखारी नंगी ज़मीन पर अपने झोले का तकिया बनाये,बग़ल में एक जोड़ी प्लास्टिक की चप्पल रखे आराम से लेता था ।उसने लाल रंग की गंदी सी लुंगी और फ़टी बनियान पहन रखी थी । मैन सोचा…आदमी भी कितना समझौता वादी होता है , जैसे हम लोग नर्म बिस्तर पर तकिये के साथ कुशन भी दाएं बाएं रखते है,उसी तरह इसने झोला और चप्पल रख छोड़ी है । में ये सोच ही रही थी कि एक और भिखारी जो ,पहले वाले भिखारी का हमउम्र ही था और उसने भी गन्दा चीकट से लम्बा कुर्ता पहन रखा था ,नीचे का अंग सम्भवतः नग्न ही था,पर कुर्ते की लंबाई के कारण जो भी था पर्दे में था । उसने लेटे हुए भिखारी से कुछ कह ।क्या…ये मैं दूरी होने के कारण सुन नही पाई।हैं…ये देख अवश्य कि लेते हुए भिखारी ने न में सर हिलाया और बुरा से मुँह बनाते हुए करवट बदल ली ।ये क्या माजरा है…? क्या एक भिखारी …दूसरे भिखारी से कुछ मांग रहा है ..?इस सोच ने मेरा कौतुक और बढ़ाया । फिर मेरी दृष्टि उन दोनों पर जम कर रह गई। दूसरे भिखारी ने पहले वाले के पास बैठते हुए उस पर हाँथ रखा और फिर कुछ कह । पहले वाले ने उसे धुरते हुए अपने दोनों हाँथ जोड़ लिये। दूसरे वाले ने हार नही मानी उसने ..पहले वाले का हाँथ पकड़ कर उठा दिया और उसकी अधपकी बेतरतीब सी दाढ़ी सहलाते हुए उसे फुसलाने लगा। मेरा कौतूहल बढ़ता ही जा रहा था …दया में उठी मेरी नज़र को अब एक विषय मिल गया था ।मेरे सामने एक दृश्य था ,पर मूक संवाद के साथ । मैन देखा अब दूसरा वाला भिखारी ,पहले वाले के चेहरे के पास अपने कुर्ते का दामन यूँ हिला रहा था जैसे उसमे ढेर सारे सिक्के भरे हों…. जबकि में साफ़ देख रही थी वो खाली था ।ओह… ये तो मानसिक रूप से विछिप्त लगता है ..? अब मैं कुछ सन्तुष्ट सी होकर उधर से नज़र हटाना ही चाहती थी कि….दूसरा वाला भिखारी कुर्ते की जेब से देशी शराब का पव्वा और 10 का मुड़ा तुड़ा नॉट निकाल कर पहले वाले के सामने लहराने लगा,और बीच,बीच मे अपना कुर्ता भी ऊपर उठ देता ।पहले वाले ने अपने सूखे होंटो पर ज़ुबान फेरी और पव्वे की तरफ झपटा । दूसरे ने तवायफ की तरह एक तोडा लिया और ज़रा सा दूर जा कर उसे ललचाने लगा । अंततः पहला भिखारी उठा उसने भी अपनी लुंगी उतार कर झोले के हवाले की और दूसरे भिखारी से लिपटते हुए फुटपाथ से सटे गन्दे नाले के अंधेरे की ओर बढ़ गया । एक मूक संवाद आज मुझे बहुत कुछ समझा गया था ,और में सोचने लगी ….आदमी भी कितना समझौतावादी होता है।

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