#Kahani by Rifat Shaheen

लघुकथा  –  खुशबू  –  रातरानी का फूल

 

कई दिनों से में उसे प्यार भरी नजरों से देख रहा था।उसका हुस्न,और अभी अभी फूटा शबाब,उसके वजूद की रानाइयों में चार चांद लगा रहा था ।रात के गहरे सन्नाटे और चांद तारों की हमराही में वो अपना घूंघट उतार देती ,और अपने पूरे निखरे रूप में गजब से ढाया करती ,तब मैं अपनी ज़ात से बेनियाज़,आस पास के माहौल से बेखबर,उसे घण्टों…निहारा करता,उसके वजूद से उठने वाली खुशबू को एहसासों के प्याले में ,भर भर कर पीता। वो जो मेरी शब ए परेशा का एक हिस्सा बन चुकी थी,अपनी पुर बहार ज़ात से मेरी रातों को आरास्ता किया करती ,मेरे वजूद को अपनी ज़ात से उठती खुशबू की डोर से ,अपनी तऱफ खैंच लिया करती । अपने सब्ज़ पैरहन पर सफ़ेद दुपट्टा ओढ़े,वो कोई शहज़ादी मालूम होती,या फिर दूर देश से चाँदनी के रथ पर सवार कोई रानी….

हान वो रानी ही थी ,रात की रानी।  (रातरानी का फूल)

लेखिका,  रिफ़अत शाहीन

 

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