#Kahani By Sagar Yadav Jakhmi

लघुकथा ( रईस)

पूस का महीना था.कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी. मै अपने दोस्त अनिल के साथ एक कम्बल लेने बाजार गया.
दुकान पर भीड़ कम होने के बाद मेरे दोस्त अनिल ने दुकानदार से कहा -” मेरी पत्नी के लिए एक अच्छी सी शाल दीजिए ”
दुकानदार – “भाईसाहब! भाभी जी के लिए कितने दाम तक की शाल दिखाऊँ?”

अनिल – “आप पैसे की चिँता न करें.ऐसी शाल दिखाइए जिसे रईस लोग पहनते हैं”.

“ठीक है बाबूजी,कहकर दुकानदार ने अनिल को पन्द्रह सौ की एक शाल पैक करके पकड़ा दिया.”

पत्नी की शाल खरीदने के बाद अनिल कुछ देर तो शांत रहा फिर बोला -” भाईसाहब! एक शाल मेरे बाबूजी के लिए भी दीजिए.”

दुकानदार- “भाईसाहब !कितने दाम तक दिखाऊँ ?”

दीपक- ” जरा सस्ते मेँ दिखाना”
अनिल के ये शब्द सुनकर मेरी आँखेँ नम हो गईँ. थोड़ा साहस करके मै उसके
पास गया और पूछा,” अनिल तुम्हारे पिताजी रईस आदमी नहीँ हैँ क्या?”
मेरे शब्द सुनकर अनिल का सिर शर्म से झुक गया और उसने दुकानदार को एक मँहगी शाल
निकालने का आर्डर दे दिया.

– सागर यादव ‘ जख्मी ‘

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