#Kahani by Surendra Kumar Arora

मॉम

 

शाम के सात बज चुके थे . लगभग सभी लोग अपनी – अपनी सीट से  उठ भी चुके थे . लेपटाप का स्विच आफ करके स्मृति भी  अपनी आफिस चेयर से उठी और   पर्स संभालाने के बाद  उसमें से मोबाईल निकाल कर नंबर मिलाया . मोबाईल का गर्दन और कंधे के बीच में दबाकर चलते – चलते ही बोली ,” हाँ  मम्मी , आफिस से निकल रही हुँ . ”

” थक जाती होगी मेरी बच्ची . सुबह नौ बजे   घर से निकली और  अब शाम के सात बज रहे है , घर पहुँचत – पहुंचते पता नहीं आठ बजेंगे या नौ ,  ठीक है बेटा , संभाल कर गाड़ी चलाना . इस समय तो ट्रेफिक भी बहुत होता है . ”

” कोई बात नहीं  मम्मी . बेमतलब की चिंता मत लगाया करो , मैं कोई बच्ची नहीं हुँ .यह तो  रोज का काम है . पहुंच कर फोन करती हुँ . ”

” बस मेसेज कर देना .सुबह की निकली रात को घर पहुंची और  पहुंचते ही फोन से चिपक जाएगी तो तेरी सास को बुरा भी लग सकता है . घर पहुंच कर  उनके काम में हाथ बटाना .  ! ”

” बस – बस मम्मी , हर दम प्रवचन मत देती रहा करो . उनका क्या है मैं कुछ भी करूँ  उन्हें तो बुरा लगना ही है . इसके  अलावा उन्हें  आता ही क्या है ? ‘

” मेरी बच्ची नाराज हो गयी . मेरा यह मतलब थोड़े ही था .  अच्छा ठीक है नहीं कहती पर ये तो बता किसी ने कुछ कहा  है क्या ? ”

” ओह नो मम्मी , बात क्या होनी है . कुछ कहेंगीं तो सुनेंगीं भी . ”

माँ – बेटी के बीच हर दिन इस तरह का वार्तालाप होता और बहुत बार को कई बार होता और इसका नतीजा यह होता कि स्मृति  के  घर  पहुंचने में देर भी हो जाती .

आज वह घर पहुंची तो  रोज की तरह सासू माँ  किचन में दाल को तड़का लगा रहीं थी और निशांत भी घर आ चुके थे . आ क्या चुके थे खाने के लिए सलाद काट कर किचन में  माँ का हाथ बटा रहे थे .

” नमस्ते मम्मी जी ! ” उसने घर में प्रवेश करते ही पर्स को अपने बेड रूम के बिस्तर पर  रख कर किचन का रूख किया , ” अरे वाह आज तो आप भी आ गए .”

” हाँ ! मैं भी  आ गया हुँ . लगता है आज ट्रेफिक बहुत था जो तुम्हे इतनी देर हो गयी . चलो यह तो होता ही है . अब तुम ऐसा  करो फ्रेश होकर जल्दी से  आ जाओ और थोड़ी सी पकोड़ियां सेक लो तो इस सर्दी में खाने का मजा दो गुना हो जायेगा .” सुशील ने कहा .

” अरे यार मेरे  आते ही हिदायतें देने लगे . इन बातों के लिए आफिस कम है क्या जो घर में भी वही सब कि ये कर लो , वो कर लो .” इतना कहकर वह किचन के ही वाश बेसिन में हाथ धोने लगी . इसी बीच उसने कनखियों से सुशील की ओर देखा .  सुशील की त्योरिओं के चढ़े हुए पाया . अभी उसे अपनी कजन  छाया से बात करके उसे  बताना भी  था कि इस बार के  वीकेंड पर एक गेट – टू गेदर रखना  है और इधर सुशील का मूड खराब होने को है तो  बात बिगड़ती देख तुरंत बोल पड़ी  , ”  मम्मी जी  आपके  हाथ की पकोड़ियों का स्वाद बेमिसाल होता है , आप ही तल दीजिये न प्लीज . ”

” ठीक है , बेटा ! पर तू फ्रेश तो हो ले . ” माँ ने सहजता से कहा .

माँ  की सहमति देखकर  बिफर पड़ा सुशील , ” कैसी बातें करती हो स्मृति ! माँ सुबह से घर के काम में उलझी हुई है . खाने के बाद किचन समेटने में भी माँ के घंटों लग जायेंगें . किचन के अलावा भी माँ की  कोई जिंदगी है या नहीं है . आ जाओ . मिलकर सारे काम निपटाते है .”

सुशील की पुकार ने  स्मृति के दिमाग में  आज के लिए चल रही योजनाओं  को पलीता लगा दिया . झट से बोल पड़ी , ” पकोड़ियां खाने  का इतना ही चस्का है तो किसी रेस्ट्रा को आडर कर दो . दिन भर आफिस में  खट कर आने के बाद मैं आराम करना चाहती हुँ .  ” इतना कह  कर वह अपने बेड रूम की ओर चली गयी . वहां मोबाईल की घंटी पहले से खनखना रही थी और उस पर चमक रहा था , ” मॉम ” !

 

सुरेंद्र कुमार अरोड़ा

डी – 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन साहिबाबाद – 201005 (ऊ. प्र. )

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