#Kahani by Sushil M Vyas

ख़ौफ़…

जैसे घड़ी ने 5 बजाए की विनीत की नजर घड़ी पर पड़ी..उसके चेहरे पर ख़ौफ़ का साया तैरने लगा…क्योंकि अब ऑफिस से घर जाने का समय हो गया था।

विनीत घर नही जाना चाहता था क्योंकि उसे डर था की उसके साथ उस घर में फिर वही घटित होगा जो पिछले तीन दिन से हो रहा था।

पिछले तीन दिनों की उन घटनाओं को याद कर के विनीत के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई..उसका दिल पसलियों से धाड़ धाड़ करके टकराने लगा..अच्छी खासी ठंड में भी विनीत पसीने-पसीने हो गया।

इतनी देर में स्टॉफ की गाड़ी ऑफिस के गेट पर लग चुकी थी, सब के साथ विनीत भी ऑफिस से निकल कर गाडी की तरफ बढ़ गया…लेकिन जैसे उसके पैर उसका साथ ही नही दे रहे थे।उस घर का ख़ौफ़ उसके दिल में इस कदर बैठा हुआ था कि उसका बस चलता तो वो ऑफिस में ही सो जाता, या कहीं और भाग जाता..पर घर नही जाता,लेकिन उसकी मजबूरी थी,घर तो उसको जाना ही था।

बस अपने गंतव्य की तरफ निकल पड़ी,एक के बाद एक स्टॉप आते जा रहे थे।विनीत के सहकर्मी अपने अपने स्टॉप पर उतरते जा रहे थे पर विनीत अपनी सीट पर चुपचाप खोया खोया सा बैठा था।अब अगला स्टॉप विनीत का ही आ चुका था।

जैसे ही स्टॉप पर गाडी रुकी वो बहुत मरे कदमो से उतर गया,अब वो अपनी कॉलोनी की तरफ जा रहा था। जैसे जैसे कॉलोनी पास आती जाती उसकी धड़कने बढ़ती जा रही थी।अब वो अपनी कॉलोनी में आ चुका था।सामने ही उसका घर था।

घर पर पहुँच कर उसने कांपते हांथों से डोर बेल बजायी..लेकिन अंदर से कोई प्रति क्रिया नही हुई..उसने दरवाजे को धकेला तो दरवाजा चर्रर्र की आवाज करता हुआ खुल गया..वो धड़कते दिल से घर में घुसा…उसने अपनी पत्नी को आवाज देना चाही, तभी उसको बाथरूम में शॉवर की आवाज आयी वो समझ गया कि उसकी पत्नी नहा रही है।

वह दबे और डरे कदमो से आगे बढ़ा और किचन की तरह गया।ताजा खाने की महक से समझा जा सकता था कि उसकी पत्नी खाना बना चुकी है।उसने सब्जी के मर्तबान का ढक्कन जैसे ही हटाया उसकी आँखे डर और विस्मय से फैलती चली गई और वो एक जोर दार चीख के साथ बेहोश हो गया।

जो तीन दिन से उसके साथ इस घर में घट रहा था वो आज फिर घट गया था,

आज फिर लौकी की सब्जी बनी थी।

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