#Kahani by Vikas Pal

मेरा प्यार वो है

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व्योम साइकिल बढ़ाए चला जा रहा था, जाँघें भर गई थीं। थके पैर साइकिल के पैडलों से कुश्ती लड़ने से इंकार कर रहे थे। साँस की वजह से पेट के साथ छाती भी गुब्बारा हो रही थी। हारकर उसने साइकिल धीमी कर दी और लम्बी साँसें  छोड़ने लगा। पूरी मेहनत बेकार। ये पाँड़े भी, थोड़ी देर बोल के घण्टा भर अरझाए रखता है, नहीं तो आज उसका सिस्टम बन जाता। पर वह अब क्या कर सकता है,  सिवाय पछताने के।

फिर मन में उठ रहे खेद के सैलाब को दबाने के लिए खुद से बतियाने लगा– जनाब, अपनी किस्मत में शायद इसी तरह पछताना ही लिखा है। कभी कहने की हिम्मत हुई है कि आज कह देते। अकेले में तो बड़ी ‘स्टाइल’ पोंकते हो, कई बार ‘प्रपोज’ करने का ‘मैटर’ लिख कर तैयार किया है पर कभी उसके सामने जुबान हिली है। उसके सामने हड़बड़ाहट से चेहरा फक्क कर लेते हो।

‘लवलेटर’ भी तो नहीं दिया जाता तुमसे। लिखने को तो सौ पन्ने का लवलेटर लिख डालोगे पर इतनी हिम्मत नहीं कि एक पन्ना भी उसको पकड़ा सको। अरे खुद न दो तो किसी और के हाथ से दे दो। यही कहते हो, किसके हाथ से दिया जाए; पूरी दुनिया में तुम्हे कोई और हाथ नजर नहीं आता। कितनों को लवलेटर लिखाने के लिए तुम्हारा हाथ नजर आ गया और एक  उल्लूनरेश तुम हो…चलो हटाओ चोरी छिपे उसके बैग में तो डाल ही सकते हो या फिर किताब के बीच में छिपाकर उस तक पहुँचा सकते हो। लवलेटर देने वाले को तमाम तरीके हैं पर तुम पूरे लुल्ल हो; लवलेटर देना तुम्हारे बस की बात नहीं।

सोंचो अगर आज उससे अपने मन बात कह देते और वह इंकार कर देती तो?  नहीं वह इंकार नहीं कर सकती, वह भी तो चाहती है। अगर न चाहती होती तो ‘लंच’ में उसके सामने बैठ कर उसे देख-देख क्यों मुस्कुराती है। और वह भी तो उसको सच्चा प्यार करता है, दिल उघाड़ कर दिखा देगा तो बच्ची की ना बोलने की हिम्मत नहीं होगी।

चलो कोई बात नहीं; शाम को जब वो छत में आएगी तो इशारों से ‘आई लव यू’ कह दूँगा। रोज दिन-दिन टालने से सब खेल न बिगड़ जाए। वैसे भी क्लास भर के लड़के उसके पीछे पड़े हैं। असिसवा– अरे वो तो बहुत हरामी है, साला बाल कभी कटाता ही नहीं; उनको ऐसे बीच से काढ़ कर आता है जैसे सलमान खान का मौसिया यही है। जींस धाँस कर स्कूल आता है; इसीलिए ‘विदाउट ड्रेस’ में अक्सर बैल जैसा कुटता है। आता-जाता कुछ नहीं पर टीचरों के सामने बड़ी स्टाइल से अंग्रेजी झाड़ता है। और तो और ससुरवाला ठीक उसी के सामने वाली सीट में बैठता है; कहीं वो असिसवा से सेट हो गई तो?

ऐसा हो ही नहीं सकता। कहाँ वो एकदम सिम्पल रहने वाली और कहाँ ये बांगड़ू असीस– पूरे के पूरे जंगली।

अरे क्यों नहीं हो सकता? वो बिचारी सीधी-सादी तो है, इसके चक्कर में फँस भी सकती है। ये सोचकर ही अपनी तो जान निकली जा रही है, अगर असल में हो गया तो मर ही जायेंगे–शायद।

घर पहुँच कर व्योम ने साइकिल बरामदे में खड़ी कर दी। घर में ताला लगा था, लगता है बुआ बरसीम लाने निकल गईं। बाहर इकट्ठा गोबर के ढेर और बिखरा कूड़ा उसकी राह देख रहे थे कि कब वह आए और झाड़-बटोरकर झौवे में भरकर उन्हें घूरे तक पहुँचाए। व्योम को देखकर भैंस भी चारे-पानी को छटपटाने लगी। ये भैंस भी पुजाने लायक है अगर जरा देर और सानी-चारा न हुआ तो खूंटा उखाड़ डालेगी। अभी कल ही एक खूंटा उखाड़ डाला, उसके स्कूल से आकर खाना खाने भर में ही न जाने कौन सी देर हो गई थी जो इस महरानी की भभाक नहीं सधी।

व्योम ने फटाक से ड्रेस उतारी, टीशर्ट और लोवर चढ़ाया बाल्टी उठाकर भैंस के आगे पानी रखने लगा।

 

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