#Kahani By Vishal Narayan

-” रसगुल्लों की चोट “–

ऑफिस से आते वक्त थोड़ी थकान लगी तो गाड़ी मिठाई की दुकान के आगे रोक दी. पहला रसगुल्ला अच्छा लगा, दुसरे में ज्यादा स्वाद था, तीसरा बेहतरीन था. ऐसे कर के मैं चार पाँच रसगुल्ले खा गया. रसगुल्ले खाकर इतना अच्छा लगा कि मत पुछिए. लगा दुनिया में कही भी अगर पैसों की सही किमत लग रही है तो वो बस रसगुल्ले हैं. पाँच रसगुल्लों के अस्सी रूपये हुए थे. कोई बड़ी बात न थी. पर्स खोला तो पर्स की पहली पॉकेट से बाबूजी झाँक रहे थे. सारे रसगुल्लों का स्वाद फिका पड़ गया.

 

उस समय बाबूजी की तबीयत थोड़ी खराब थी और घर की आर्थिक स्थिती कुछ ज्यादा ही खराब. मैं किसी काम से बाहर गया था और बहनें अपने कमरे में थी. अचानक से बाबूजी का बीपी बढ़ा और वो कुर्सी से चक्कर खाकर गिर पड़े. नाक के उपर चोट लगी और खून पानी की तरह बहने लगा. बड़ी दी ने किसी तरह उनको बिस्तर पर लिटाया और डॉकटर बुला लायीं. तबतक मैं भी आ गया. डॉक्टर ने मरहम पट्टी की और कहा कि कमजोरी हो गयी है. कुछ इंतजाम करो और हाँ, अभी के लिए दो चार रसगुल्ले खिला दो.

 

ये बातें बाबूजी ने भी सुन ली. मैं बाहर निकलने लगा तो बाबूजी को लगा कि मैं रसगुल्ले लेने जा रहा हूँ. मेरा हाथ पकड़ लिया. मैंने कहा दवाई लेकर आता हूँ. तब छूटा मेरा हाथ. मैंने दवाई लाकर रख दी. मुश्किल से किसी तरह दवा के पैसे दे पाया था. मेरी जेब खाली हो गयी थी और बाबूजी के सारे पैसे भी मैं ही रखता था. मेरी जेब खाली है, ये बात बाबूजी को भी पता थी. दवाई रखने के बाद मैंने धीरे से कहा. डॉक्टर ने रसगुल्लों के लिए कहा है. उसके बाद जो बाबूजी ने कहा उसपर मैं न तो रो पाया और ना ही हँस पाया. डॉक्टर को क्या पता. “रसगुल्लों से मेरे दाँत में चोट लग जाती है.”

 

मुस्कुरा रहे थे बाबूजी. मैं भी मुस्कुरा दिया. मुफलिसी की ये मार अंदर तक जख्म कर गयी थी. आज सबकुछ है. खुद मिठाई खा रहा हूँ. औरों को भी खिलाता हूँ. सोच रहा हूँ आज बाबूजी होते तो उनको रसगुल्ले खिलाता. आज उनके दाँतों में चोट न लगती. रसगुल्लों के मीठे मीठे रस आँखों से बहने लगे थे. काश कि बाबूजी होते.

-” विशाल नारायण ”

 

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