#Kahani by Vishal Narayan

–” यादों का मौसम “–

 

आँखों के परनालों के बहने का कोई वक्त, समय या मुहूर्त नहीं होता गर्मी, जाड़ा, बरसात, सुबह, शाम कोई भी मौसम कोई भी समय इनके लिए प्रतिकूल नही होता. उनका जब मन करे निकल पड़ती हैं. पहले पानी की पतली धार से शुरू होकर नदी का रुप लेती हैं और फिर समंदर बन जाती हैं. हाँ मेरे साथ गनीमत यही बख्शी है कि सबके सामने अपना विराट रूप नहीं दिखातीं. जब मैं अकेला, बिस्तर के किसी कोने में सिमटा होता हूँ तब आती हैं. मुझसे मिलती हैं, मेरा हाल चाल पुछती हैं, मन की सूखी जमीं को सिंचित कर जाती हैं. ख्वाबों खयालों के खेतों में जितनी भी दरारें होती हैं सब को भर जाती हैं. अब जब कि खेत की दरारें भर जाती हैं, पानी मिल जाता है तो कुछ न कुछ तो उपजेगा ही न.

 

ऐसे में निकल कर आता है मेरा बचपन. मुझे तो याद भी नहीं आता. कैसा दिखता था मैं, क्या क्या करता था. उस समय के लोग कैसे थे. बस घरवालों, अगल बगल वालों ने जो बताया है उसी से बहुत सारी तस्वीरें बना रखी हैं मैंने. अपने भाई बहनों में सबसे छोटा था मैं, पाँचवें नंबर पर. जाहिर सी बात है मेरे लालन पालन में कोई कमी न रही होगी. माँ, बाबूजी, बाबा, चाचा, बुआ के आलावा चार बड़ी बहनों का स्नेह भी पाया मैंने. मैं विधी के नियंता को कोटी कोटी धन्यवाद देता हूँ कि उसने मुझे चार बहनें दी और वो भी बड़ी. जिनकी बड़ी बहनें हैं, वो समझ गये होंगे. बड़ी बहन का होना मतलब किसी भी मुसिबत के पहले एक रक्षास्तंभ और जिसके पास चार चार रक्षास्तंभ हों, उसके भाग्य के क्या कहने.

 

आज बाबूजी के साथ संस्मरण की दुसरी आखिरी किस्त है. बारह दिन की इस यात्रा में, बाबूजी की सहधर्मिणी यानी कि माताजी को याद न करूँ तो लगेगा कि बाबूजी की याद में कमी रह गयी. माँ क्या थी, उनका स्नेह कितना था यह सब लेखनी से परे की बातें हैं. मैंने जिससे भी सुना है उनकी तारीफ ही सुनी है. आज भी गाँव की बड़ी बुढ़ी औरतें मुझे मेरे नाम से कम, माँ के नाम से ज्यादा जानती हैं. सच कहूँ तो जब वो लोग मेरा हाथ पकड़कर कहती हैं न कि “ललमुनिया क बेटा ह.”  खुद को कैसे सँभालता हूँ लिख नहीं सकता. शरीर के सारे रोएँ गनगना जाते हैं. पूरा का पूरा समंदर पल भर में आँखों से बाहर छलक पड़ता है.

 

पर क्या करूँ बड़ा हो गया हूँ न. सबके सामने तो नहीं रो सकता तो खुद को जज्ब कर के वहीं बैठ जाता हूँ. मुझे माँ के साथ रहने का ज्यादा वक्त नहीं मिला तो उन पुरानी औरतों के मुँह के माँ को सुनना अच्छा लगता है. बाबूजी अपनी पीढ़ी में सबसे बड़े थे तो माँ भी सबसे बड़ी बहुरिया थी. उन दिनों बहुओं की उत्कृष्टता का मापन उनकी सेवा के स्तर से किया जाता था. माँ दिन भर घर के काम काज देखती और रात भर घर बड़ी बुढीयों को मालिश करतीं. मुझे तो गुस्सा आता है पर उनदिनों के लिए यही सही माना जाता था. और माँ इस उत्कृष्टता के स्तर में उत्कृष्टतम थीं. पर किस्मत कभी भी माँ के साथ नहीं रही. उन्होंने चार बेटीयाँ जनीं. आज के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं पर उनदिनों के लिए बहुत बड़ी बात थी. लगभग सारे लोंगों ने नकार दिया. कोई पूछता तक न था. यहाँ तक कि बाबूजी भी ठीक से बात न करते थे.

 

जैसे सीताजी के गृह त्याग के लिए श्रीरामचँद्र युगों युगों तक दोषी माने जाएँगें. मैं इस एक बात के लिए बाबूजी को कभी माफ न कर पाउँगा. लोकलाज के ड़र से या किसी भी बात से आपने उन्हें अनदेखा कर दिया. वो किसके आसरे अपना घर छोड़कर आयी थी. समाज के किस ठेकेदार के साथ गाँठ बाँधकर फेरे लिए थे उन्होने. आपने तो कह दिया आपको बेटा चाहिए. पर नौ महिने कोख सँभालना इस दो सेकेण्ड़ के वाक्य जितना आसान नही होता बाबूजी. उन्होने वो भी किया. आपको बेटा दिया. आपको खुशियाँ दीं पर खुद वो, खुशियाँ कहाँ देख पायीं. एक बेटे को लेकर जितने अरमान एक बाप को होते हैँ उससे कई गुना ज्यादा अरमान एक माँ के होते हैं. ये जहान छोड़कर जाना पड़ा उन्हें. जिन बेटीयों के लिए आपने उन्हें अनसुना कर दिया, उन्हीं बेटीयों ने सँभाला आपके इस बेटे को.

 

और एक बात जो आपने कभी मुझे जाहिर न होने दिया. माँ के जाने का सबसे ज्यादा नुकसान आपको हुआ. आपके टुटने की वजह सबको आपकी बीमारी लगती है. पर एक पत्नि का न होना सारे बीमारीयों की वजह थी, ये किसी को न दिखेगा. आपके जाने के बाद, आपकी और माँ की तस्वीर फोटोशॉप कर के एकसाथ बनवायी है. मुझे आज भी लगता है आपलोग चले आओगे. अपने लिए न सही अपने बेटे के लिए ही सही, एकबार तो चले आइए. कभी कभी लोग कह देते हैं पगला गया है. मैं मान भी जाता हूँ. पर आँखों में जो समंदर उमड़ पड़ते हैं, उनका क्या करुँ. काश कि आपलोग साथ होते.

–” विशाल नारायण ”

 

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