#Kahani by Vishal Narayan

–” बाबूजी के साथ “–

कभी कभी सोचता हूँ. मेरे पास क्या नही है. इतनी बड़ी धरती है. शस्य श्यामला, विविध रंगो से परिपूर्ण, जिसपर सारे जीव जंतु जीवन यापन करते हैं. हँसते खेलते हैं. सुख दुख से दो चार होते हैं. उसी श्स्य श्यामला भुमि पर मैं भी रहता हूँ. इतना बड़ा आसमान है, जिसमें रंग बिरंगे पंक्षी, तरह तरह की आकृति प्रकृति के बादल, समय समय पर रिमझिम रिमझिम फुहारें बरसा करती हैं. धरती तो कोई रोक झेक भी ले पर आसमान कोई नहीं बाँट सकता. जहा तक मेरी नजर जा सकती है वहाँ तक के आसमानी दृश्यों का आनंद ले सकता हूँ. इतना बड़ा सूरज है पूरी धरती को आलोकित करता है, रौशनी देता है. उस ज्योतिपूँज का ही छोटा सा हिस्सा मेरे लिए भी उजाला लाता है. इतने प्यारे प्यारे सितारे हैं. इतना मनोरम चँदा है. सम्पूर्ण चराचर जगत को शीतल करता है. सबको सुकून देता है. उसकी शीतलता का कुछ हिस्सा तो मेरे लिए भी होगा. इतने सुनहरे दिन हैं. हर सुबह नयी उर्जा देते हैं. सबको आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. इतनी इतनी प्यारी प्यारी रातें हैं. सबको आराम देती हैं. हर आने वाले कल के लिए ताजगी भरती हैं. इतने मनभावन पुष्प हैं, बाग उपवन हैं. इतनी भिनी खुश्बू बिखेरते हैं कि मन मोह लें. कितनी रमणियाँ अपना हृदय इन फूलों पर हार जाती हैं. इतनी मोहक हवा है. सबके हृदय में तरंग भर दे. सबकी प्यास बुझाने वाले जल स्त्रोत हैं. मन में संगीत भरने वाले झरने, कल कल करनेवाली नदियाँ हैं. इन सबको देखकर प्रफुल्लित होता है मन. हर घड़ी साथ देनेवाले मित्र हैं. घर है, परिवार है. पैसा है, गाड़ी है. जिन्दगी को सुन्दर और सुगम बनानेवाले हर प्राकृतिक या फिर गैर प्राकृतिक संसाधन हों सब मौजूद हैं मेरे पास. फिर ऐसा क्या है जो टीसता रहता है. वो जख्म क्या है जो हर वक्त रिसता रहता है.

आप जीवन को बेहतरीन बनाने के जितने तरीके जानते हों या फिर आपने जो भी उपर पढ़ा उन सबको एक तरफ रख लिजिए और एक तरफ बाबूजी को रख लिजिए. ये सारे सुख बेकार लगेंगे. वो है तो बाकी किसी आनंद, किसी संसाधन की जरूरत नही. मैं अभी भी सारे साधन संसाधन छोडने को तैयार हूं, बस बाबूजी दे दो. काश कि बाबूजी साथ होते.

–” विशाल नारायण ”

 

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