#Kahani by Vishal Narayan

” मेरा भगवान चला गया “–

 

हम सभी किसी न किसी भगवान को मानते हैं और गाहे बगाहे उनके याद भी करते हैं पर अधिकांशत हम या तो ड़र से या फिर किसी चाहत से ऐसा करते हैं. भय से याद किए जाने वाले देवों में प्रमुख माता दुर्गा और बजरंगबली तथा चाहनेवालों के लिए देवी सरस्वती और देवी लक्ष्मी का दरबार सदैव खुला रहता है. पर मैं जिस भगवान की बात कर रहा हूँ उसके रहते कोई ड़र नहीं सताता और अगर वो है तो आपको खुद से कोई चाह रखने की भी जरूरत नहीं.

 

जी हाँ, मैं बाबूजी की बात कर रहा हूँ. आप इन्हें पिता जी, पापा, डैडी के नाम बुलाते होंगे. मैं बाबूजी के नाम से बुलाता हूं. हो सकता है आप किसी अन्य इष्ट देव को मानते हों पर मेरे इष्ट तो वही हैं. आज मेरे उस देव की छठी बरसी है, पुण्यतिथि है. ऐसे तो मुझे उन्हें याद करने के लिए किसी विशेष दिन की आवश्कता नहीं होती पर ये दिन खुद मेरे लिए विशेष हो जाता है. उनकी यादें मानस पटल पर उभरती रहती हैं. आँखों की पलकें खुद ब खुद गीली हो जाती हैं.

 

आज से छः वर्ष पूर्व हम वाराणसी में, जिसे मोक्ष की नगरी कहा जाता है, इक साथ थे. वो आईसीयू में और हम आईसीयू में झाँकने के लिए बनी छोटी सी गोल खिड़की से उनको निहार रहे थे. नाक के रास्ते दो तीन नलियाँ और मुँह में दो तीन पाईप्स लगी हुई थीं. उनकी आँखें आधी खुली और आधी बंद, बस छातियों में स्पंदन था. कुछ डॉक्टर्स उनके आसपास खड़े थे.

 

दो हजार बारह आने से पहले ही कुछ लोग कह रहे थे कि बारह में धरती पलट जाएगी. सबकुछ डूब जाएगा. पर मेरे लिए तो अफवाहें भी सच साबित हुईं. सच में सबकुछ डूब गया मेरा. बाबूजी की छाती में बलगम भर गया था. साँस लेने में दिक्कत हुई थी तो अस्पताल में एड़मिट कराया गया था. डॉक्टर्स ने कहा नब्बे​ प्रतिशत ना और दस प्रतिशत ही हाँ है. हमने कहा दो प्रतिशत भी बाकी हो तब भी बचा लो मेरे भगवान को.

 

मैं बाहर ही बाहर आया था. उनसे मिलने. खिड़कियों से झाँक रहा था. हिम्मत न हो रही थी. अपने देवता को ऐसे देखने की. डॉक्टर्स के जाने के बाद, मुझे भी एप्रन पहनाया गया. उनके सामने गया. मन तो किया जी भर के रो लूँ. कितनी बातें करनी थीं उनसे पर वो तो कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. अपने दोनों हाथों से उनके दाहिने हाथ को पकड़ लिया था मैंने. हौले से मेरे हाथों को दबाया था उन्होंनेऔर हल्की सी पलकें झुकाई थीं.

 

बस इतना ही संवाद था हमारी आखिरी मुलाकात का. वो शायद मेरा ही इंतजार कर रहे थे. अगर मुझे पहले से पता होता तो मैं और देर से आता पर विधि के चक्रव्यूह से अभिमन्यु कैसे बचता. आ ही गया. इधर मैं आया और उधर मेरा भगवान चला गया.

 

आँखें चाहती थीं कि पूरा समंदर उड़ेल दें पर जैसे सदियों का सूखा पड़ गया हो. हृदय धड़कने के सारे पैमाने तोड़ देना चाहता था पर कोई स्पंदन हीं बाकी न बचा था. सुन्न सन्नाटा. मैं तो कुछ समझ ही नहीं पा रहा था. जिन आँखों से दुनिया को देखना और समझना सीखा है उन आँखों को कैसे मूँद दूँ. जिस कंधे पर बैठकर पुरी दुनिया देखी है, उसे अंतिम कंधा कैसे दूँ. जिसकी गोद में बैठकर मैंने दुनिया का अप्रतिम सुख पाया है, उसे विदा कैसे करूँ.

 

आज भी यादों के पंक्षी ख्वाबों के आँगन में उतरते है, दाना चुगते हैं, पानी पीते हैं और उड़ जाते हैं. मैं बैठा-बैठा बस देखता रहता हूँ. मन में आता है उस भगवान से जाकर पूँछूँ, ऐसा क्या गुनाह किया था मैंने. अभी तो ठीक से बचपन भी नहीं बीता था. पर मैं पूँछूँ भी तो किससे. मेरा तो भगवान हीं चला गया . बाबूजी होते तो मैं उनसे पूछता और हर बार की तरह वो प्यार से समझाते. काश कि आज भी बाबूजी होते.

✍–” विशाल नारायण “

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