#Kahani by Vishal Narayan

“लड़का हूँ न”–

 

My Dear Mother,

आज कुछ पुरानी तस्वीरें पलटते हुए ये तस्वीर हाथ लगी और साथ में एक पुरानी चिट्ठी भी, जो कभी पाँचवीं में पढ़ते वक्त आपको लिखी थी मैंने. इन दस पन्द्रह सालों में कागज फाख्ता हो गया है और स्याही बदरंग. पर उस पर लिखा सवाल अभी भी जस का तस है. कहाँ हो अम्माँ.

 

मुझे मालूम है मेरी ये चिट्ठी न पहले आपतक पहूँची थी न अब पहूँचेगी. पर आपको चिट्ठी लिखना मुझे बहूत ज्यादा सूकून देता है. बस इसिलिए आज भी लिख रहा हूँ.

 

इन दिनों छूट्टीयों में गाँव आया हूँ. यहाँ सब कुछ अच्छा है पर एक कमी यहाँ की सारी अच्छाईयों पर पानी फेर जाती है और उससे भी ज्यादा जब गाँव की बूढ़ी औरतें जिन्हें कुछ दिखायी नहीं देता बस हाथों से छूकर आभास करती हैं. जब मेरे गाल छूकर कहती हैं न ” ललमुनिया के बेटा ह” तो मत पूछीये अम्माँ. मेरा रोम रोम तड़प उठता है. जी भर के रोने का मन करता है. आँसूओं के समंदर में डूब जाना चाहता हूँ.

 

पर क्या करूँ रो भी नहीं पाता, लड़का हूँ न. लोग क्या कहेंगे आपका बेटा रोता है. आपने चार लड़कियाँ जनी, पाँचवीं भी लड़की क्यूँ नहीं पैदा की. कम से कम जी भर के रो तो लेता. रोने के लिए मुझे रात का इंतजार करना पड़ता है कहीं कोई देख न ले.

 

आप चिंता न किजिएगा आपका बेटा बड़ा हो गया है, रोता नहीं. हाँ, बस रोज तकिये गीले हो जाते हैं. ये चिट्टी भी गीली होकर खराब हो जाए, इससे पहले कलम को रोकना हीं ज्यादा अच्छा है.

 

आपका बेटा                                         विशाल नारायण

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