#Kahani by Vishal Narayan

” वो नहीं आया “–

 

जिसने मुझे चलना सिखाया था. जिसकी गोद में बैठकर मैंने पूरी दुनिया देखी थी. उसने मुझे ए, बी, सी, ड़ी तो न सिखाया था पर जिन्दगी जीने के लिए सबसे जरूरी बातों की तालिम उसी ने दी थी. मेरी बातों में, मेरे हावभाव में उसकी झलक दिख जाया करती है. ऐसा मैं नहीं, लोग कहते हैं.

 

मेरी हर खुशी, हर गम में शरीक रहा है वो. उसके लिए ‘वो’ शब्द का संबोधन यूँ तो अच्छा नहीं लगता मुझे पर उसके जाने के बाद मुझे हर जगह दिखने लगा था वो. मुझे सँभालता,  मुझे सबसे बचाता था वो. और जब कभी मैं ड़र जाया करता ‘घबराईए नहीं’ समझाता था वो. उसकी मुझसे नजदीकियाँ हीं इतनी नजदीक थीं कि उसका संबोधन वो हो गया था मेरे लिए.

 

मेरे नये घर का गृहप्रवेश था उस दिन. यूँ तो सबको कार्ड़ भेजकर निमंत्रण दिया था मैंने पर ये वो था जिसे सबसे पहले बुलाया था मैंने. ना कोई कार्ड, ना कोई संदेशा, बस कह दिया था मैंने और यकीन इतना कि वो नहीं आए हो ही नहीं सकता. किसी को दस्त-बुखार लग जाए, किसी के लिए देश भर में हड़ताल-रोड़ जाम हो जाए, किसी की परीक्षाएँ निकल आएँ, किसी की नौकरी लग जाए. पर ये वो था जो अपना सबकुछ छोड़ के आता मेरे लिए. सारी दुनिया ये लड़ भीड़कर खड़ा होता मेरे साथ. ये वो छाता है जिसकी जरूरत मुझे धूप के साथ साथ छाँव में भी है.

 

गृहप्रवेश की पूजा शुरू हो गयी. लोग आने लगे पर वो नहीं दिखा. पूजा आगे बढ़ती जा रही है, पण्डित मंत्र पढ़े जा रहे हैं, मुझसे भी कुछ कुछ करवाया जा रहा है. पर मेरा ध्यान तो कहीं और है. सब दिख रहे हैं पर वो नहीं दिख रहा. मुझसे नाराज हो गया क्या. मेरा घर पसंद नहीं आया इसलिए चला गया. उसका गुस्सा भी मेरे ही जैसा है. पर बता के जाता वो. मुझसे मिले बिना कैसे जा सकता है वो.

 

मेरा बेचैनी बढ़ती जाती थी, आँखों में ओस जमते जाते थे. घण्टे दो घण्टे बाद पूजा खत्म होने को आ गयी पर वो नहीं दिखा. आँख में जमीं ओस अब बड़ी बड़ी बूँदों में पिघलने लगी थीं. पण्डित ने कहा अपने देवताओं को याद करो. सारे देवी देवताओं को याद करके क्या करता मैं जब वो हीं नहीं आया.

 

ओस की बड़ी बड़ी बूँदें पलकों से नीचे उतरने लगी थीं. आँखें बंद कर के उसकी तस्वीर के आगे हाथ जोड़ लिया था मैंने. उसके लिए मेरे हाथ तो हमेशा ही जुड़े रहते थे पर पहली बार खुद को इतना कमजोर महसूस कर रहा था मैं. हिम्मत न हो रही थी उसकी तस्वीर देखने की फिर भी पलकें उठाईं मैंने. तस्वीर से मुस्कुरा रहा था वो और हर बार की तरह कह रहा था “घबराईए नहीं. यहीं हूँ मैं.” जी में आया तस्वीर से निकाल कर बाँहों में भर लूँ. पर खुद को सँभाल लिया मैंने. पलकों पर उतर आयी ओस की बूँदें धीरे से मुस्कुरा रही थीं और धीरे धीरे मुस्कुरा रहा था मैं.

✍–” विशाल नारायण ”

 

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