#Kahani By Vishal Narayan

-” टिकट जरूर लेना “–

ट्रेन की खिड़की से सर टिकाकर बाहर का नजारा देखना कितना सुकून देता है न. सरपट पिछे भागते गाँव, पेड़- पौधे, जंगल और इन्हीं जंगलों में घुमते हुए तरह तरह के जीव- जंतु. यह सुकून नैसर्गिक होता है. पर ये नैसर्गिक सुकून, आनंद तब देता है जब आप आराम से हों. आपके दिल में कोई चूभन न हो, कोई सिकन न हो, कोई बेचैनी न हो. अब पूछिएगा बेचैनी क्यूँ होगी तो दुनिया में इस मर्ज के तो लाखों कारण हैं. लगे हाथ दो चार मैं भी गिना देता हूँ. हो सकता है आपको पास ज्यादा सामान हो और चोर उच्चकों का डर सता रहा हो. हो सकता है आपके पास अवैध सामान हो और पुलिस का डर का सता रहा हो. या फिर ये भी हो सकता है कि आपके पास टिकट न हो और आपको टीटी से पकड़े जाने का डर सता रहा हो.

शायद आपको बिना टिकट यात्रा करने का सौभाग्य न मिला हो. इसे सौभाग्य इसलिए लिख रहा हूँ कि हो सकता है आप किसी संपन्न घर में अवतरित हुए हों और टिकट के पैसे बचाना आपकी मजबुरी न रही हो. अब आप कहेंगे दस रूपये बचाकर क्या हो जाएगा. दस रूपये का तो समोसा खा जाते होगे. हो सकता है समोसा खाना आपके लिए एक नगण्य सी बात होगी. आज की तारिख में ये मेरे लिए भी नगण्य सी बात हीं है पर ये उन दिनों की बात है जब समोसा दो रूपये पचास का हुआ करता था और ये दो रूपये और पचास पैसे भी बहुत महँगे हुआ करते थे मेरे लिए.

ऐसा न था कि मेरे जेब में पैसे कम हुआ करते थे पर जितने पैसे आते था खर्च उस से कहीं अधिक का हुआ करता था. बाबूजी, अपनी तनख्वाह आते ही मुझे ब्लैंक चेक पर साइन कर के थमा देते. खाता चालू रहने के लिए जरूरी पैसे छोड़कर बाकी सारे पैसे निकालने को कहते और साथ में एक तस्दीक भी कि अगला वेतन आने तक घर का खर्चा इसी में चलाइएगा. बाबूजी के वेतन से मुझे घर का खर्चा चलाना होता. बाबूजी का वेतन एक महिने का खर्चा चलाने के लिए कम न था पर बिहार सरकार अगले महीने का वेतन अगले साल में भी देगी या नही देगी इसकी भी कोई गारंटी नही होती. इस पैसे से बाबूजी की दवाई, हमारी पढ़ाई का खर्चा और बड़ी दी जो पटना में रहकर मेडिकल की तैयारी कर रही थी, उनका खर्चा भी चलाना होता था.

उन दिनों एटीम नही हुआ करते थे. मुझे हर महिने दीदी को पैसे देने के लिए पटना जाना पड़ता. उन दिनों भी पटना के लिए ट्रेन की टिकट चालिस रूपये की हुआ करता थी. दिल में यही ख्याल आता कि चालिस दूनी अस्सी रूपये बचा लिए तो बहुत काम आएगा. पर इन चालिस रुपयों को बचाने में सौ रुपये का खून जल जाता. दिल धक धक करता रहता. किसी तरह टीटी से बचते बचाते पटना जाते और उसी तरह लौट भी आते.

बाबूजी को ये बात पता थी कि मैं कभी टिकट लेकर यात्रा नही करता. घर से निकलते वक्त जब भी उनके पाँव छूता. मेरा हाथ पकड़ लेते और हर बार यही कहते टिकट जरूर लेना.

पर क्या करूँ बाबूजी कुछ पैसे बचाने के लिए मैं हर बार बिना टिकट लिए ही चलता रहा. पर जब से नौकरी लगी है तब से एक भी यात्रा बिना टिकट के नही की. और तो और अब तो प्लेटफार्म पर भी जाता हूँ तो टिकट लेकर ही जाता हूँ. आज हर यात्रा के दौरान मेरे पास टिकट होता है फिर भी जब ट्रेन की खिड़की से सर टिकाकर बाहर देखता हूँ तब भी कोई सुकून नहीं मिलता क्यूँकी वो “टिकट जरूर लेना” कहनेवाला नहीं रहा.
✍–” विशाल नारायण “

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