#Kahani By Vishal Narayan

–” काश “–
मुझे यहाँ से निकालो पापा. नहीं रहना मुझे हॉस्टल में. आप जो कहोगे करूँगा पापा. लेकिन यहाँ से बुला लो मुझे. टेबल वन से टवेन्टी तक याद कर लूँगा. ए,बी,सी,ड़ी टेन टाईम्स लिख के दिखाऊँगा. लेकिन मुझे यहां से निकालो पापा.
मुझे नहीं पता जेल कैसा होता होगा पर यहाँ से अच्छा होता होगा. एक दिन गेट से बाहर झाँक रहा था, अभी पाँव बाहर भी नहीं निकाले थे कि गार्ड़ का एक जोरदार तमाचा मेरे गालों पर आ पड़ा. तब से शुरु हुआ मेरे कान का दर्द अभी तक ठीक नहीं हुआ. मैंने सूना है जेलर खुँखार होते है पर यहाँ के गार्ड़ से कम ही ड़रावने होते होंगे. लंबा चौड़ा काला भूत और ऊपर से हाथ में स्टील का डंड़ा. जोर से आवाज लगा दे तो कईयों के पैंट गिले हो जाते हैं पापा. मुझे यहाँ से ले चलो पापा.
आप जब भी आते हो उससे पहले हीं हमें तोते की तरह रटा दिया जाता है. माई नेम इज विशाल नारायण. आई रीड़ इन UKG. आई लव स्टड़ीज. आई प्ले फुटबॉल ड़ेली. आई ईट हेल्दी फूड़ एण्ड़ हैव साउंड़ स्लीप. हम सब तोते की तरह प्रिंसिपल आफिस में अपने अपने पैरेंटस के सामने रट देते हैं. लेकिन आपने कभी अकेले में पूछा ही नहीं. हम क्या पढ़ रहे हैं, हम क्या खा रहे हैं. मुझे पानी वाली दाल, कंकड़ वाली चावल से भी कोई शिकायत नहीं. फुटबॉल खेलना तो दूर ग्राउंड़ में जाने भी नहीं देते और रही बात साउंड़ स्लीप की तो रात रात भर नींद नहीं आती. हॉस्टल के पिछे एक बड़ा सा पीपल का पेड़ है जिससे रात भर सांय सांय की आवाजें आती रहती हैं. सारे बच्चे कहते हैं भूत रहता है उसपर. सू सू कितनी भी जोर से लगे, मैं क्या कोई भी बच्चा टायलेट तक जाने की हिम्मत नहीं कर पाता. मुझे भूतों से बहुत ड़र लगता है. मुझे यहाँ से निकालो पापा.
यहाँ एक भी लड़का खुश नहीं दिखता. लगता है सब पनिशमेंट पाने आएं हैं. किसी के पापा बहुत गुस्सेवाले हैं. कोई कहता है कि वो घर पर बहुत शैतानियां करता था. इसलिए यहाँ ड़ाल दिया है कि वो सुधर जाएंगे. पर मैं तो कोई शैतानी नहीं करता और आप भी अच्छे वाले पापा हो. फिर मुझे यहाँ क्यों ड़ाल दिया. मुझे यहाँ से जल्दी निकालो पापा.
आसुओं से भिंगकर घऱ आयी एक चिट्ठी आज भी मेरे जेह्न को गिला कर देती है पर साथ ही खुशी भी दे जाती है कि मेरी एक चिट्ठी पढ़कर बाबूजी मुझे हॉस्टल से निकाल लाए थे. आज भी कहीं फँस जाता हूँ तो लगता है बाबूजी को चिट्ठी लिख दूँ. मुझे निकाल लेंगे वो. पर हर बार की तरह काश की एक फांस बीच में आकर फंस ही जाती है.काश कि बाबूजी होते.
✍–” विशाल नारायण “

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