#Kahani By Vishal Narayan

–” कुछ नहीं “–
जाड़े की कड़कड़ाती रातों में जब सारा रक्त धमनियों में ठहर जाता है. शरीर के सारे अंग सिकुड़ जाते हैं. जब मस्तिष्क सिकुड़ कर अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाता तब भी बाबूजी कुछ न कुछ सोचते रहते. सोते वक्त उनके दाहिने कंधे पर मेरा एकछत्र राज होता. मुझे पता चलता कि कुछ सोच रहे हैं बाबूजी. मैं पूछ देता क्या सोच रहे हो बाबूजी. वो कुछ देर सोचते और फिर बोलते कुछ नहीं. उस समय मैं बच्चा था और मान भी लेता. कुछ नहीं. अब थोड़ा बड़ा हुआ तो समझ आया कि ये कुछ नहीं बहुत कुछ होता है.
बाबूजी की रातें अक्सर जागकर गुजरतीं थीं. मैं उनको बोल भी देता रात भर क्या जागरण करते रहते हैं. बाबूजी एक पल को संयत होते, सांस लेते फिर बोलते. अभी बच्चे हो, जवानी की दहलीज पर पांव रखने वाले हो. निश्चिंतता की नींद अभी ही आती है. भर पेट सोना. हो सकता है बुढ़ापे में नींद न आए. जैसे मुझे नहीं आती. और मैं भी मान लेता बाबूजी बूढ़े हो गए हैं इसलिए नींद नहीं आती.
अब फुर्सत से सोचता हूं तो पाता हूं कि 45-50 की उम्र का बुढ़ापा यूं ही नहीं होता. आनेवाले वक्त की चिंताएं वक्त से पहले जवानी को बुढ़ापे में तब्दील कर देती हैं. बिन मां के पांच बच्चे, उनका पालन पोषण, पैसों की तंगी, उनका भविष्य. ये सारी बातें ऐसे ही नहीं सोचते रहते होंगे बाबूजी. और ये बात मुझे तबतक समझ न आईं जबतक कि बाबूजी थे. बाबूजी के जाने के बाद यही चिंताएं जब यक्ष प्रश्न की तरह सर उठाने लगीं, दिमाग की नसों पर दवाब बढ़ने लगा तब पता चला कि नींद क्यूं नहीं आती.
आज मुझे कोई बच्चा नहीं है. कोई जिम्मेदारी भी नहीं है. बड़ी तो बहुत दूर की बातें हैं. छोटी छोटी बातें भी रातों की नींद हराम कर देती हैं. दिन में बैठे बैठे खो जाता हूं. लोग पूछते देते हैं. क्या सोच रहे हो. मैं हंस कर बोलता हूं. कुछ नहीं. और सभी उसी बच्चे की तरह मान भी लेते हैं. कुछ नहीं. काश कि बाबूजी होते तो समझते कि कुछ नहीं, बहुत कुछ होता है.
✍–” विशाल नारायण “

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