#Kahani by Vishal Narayan

— “एक से बीस”–

 

हर दिन किसी न किसी समय छोटूआ का कान पकड़े छोटी बहू दिनानाथ जी के सामने पहूँच जाती. इस छोटूआ का नाम अर्जून, कर्ण कुछ अच्छा भी हो सकता था पर नौकरानी का बेटा है तो किसी ने नाम पुछने की जहमत भी न उठाई और दस वर्ष का यह छोटू छोटूआ हो गया. इस छोटूआ की गलती बस इतनी होती कि कभी कोई बर्तन गिरा देता, गुलदान तोड़ देता या फिर रसोई के सामने जाकर खड़ा हो जाता. इस बात से छोटी बहू को लगता कि खाने का स्वाद चला जाता है. बस, उसके कान उमेठती और घुमाये घुमाये सीधे अस्सी वर्षीय दीनानाथ जी के पास पहुँच जाती. हर रोज के वही चिर परिचित शब्द कि “बाबूजी, एक से बीस तक की गिनती कीजिए और यह मुर्गा बना रहेगा“ और साथ में एक शिकायत भी कि आप बहुत तेज गिनते हो, थोड़ा धीरे धीरे गिनिएगा. दिनानाथ जी अखबार थोड़ा हटा के देखते और दशको सदियों पिछे चले जाते.

 

आठ वर्ष की उम्र में माँ बाबूजी के गुजर जाने के बाद, छोटी चाची ने उन्हें पाला पोसा. अब जैसे भी बड़ा किया श्रेय तो देना ही पड़ेगा न. उस समय के दीना को जो भोजन मिलता वो पेट भरने के हिसाब से आधा भी न होता. उसे खत्म करके वो रसोई की तरफ चल पड़ते उससे पहले हीं छोटी चाची के हाथ उसके कान तक पहुँच जाते. “कौन सा दैत्य बैठा है रे, तीन थाली भकोसने के बाद भी पेट नहीं भरता”  लप्पड़ थप्पड़ तो साधारण सी बात थी पर मुर्गा बनना बड़ा कष्टमय होता था. चाची दिना को चाचा के हवाले कर देती एक से बीस तक गिनने के लिए और चाचा ठहरे पत्निभक्त. एक से दूसरी गिनती तक जाने में अरसों लंबा समय लेते. दीना की कमर, घुटने और पाँव दर्द से ऐंठ जाते. गनिमत यहि थी कि कभी गिरा नही वरना उपर से दो लात मुफ्त में मिल जाते.

इन यादों में खोये दिनानाथ छोटी बहू को अंदर जाने का इशारा करते और छोटूआ को मुर्गा बनने का आदेश जैसे मनुहार कर रहे हों. छोटूआ अभी तक ढ़ंग से झुक भी नहीं पाता कि दीनानाथ की गिनती शूरू होकर खत्म भी हो जाती. एक, दो, तीन, अठ्ठारह, उन्नीस, बीस.

-” विशाल नारायण “

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