#Kahani by Vishal Narayan

-” उम्मीद का सूरज “–

 

आपने सूरज को पहाड़ के पिछे छुपते देखा है. शायद देखा भी हो. मेरे घर के सामने एक पहाड़ी है. सूरज हर रोज उसके पिछे छुप जाता है. जब मैं छोटा था मुझे लगता था पहाड़ी के उस पार घर है उसका. अपनी अम्मा से मिलने चला जाता है रोज.

जब थोड़ा बड़ा हुआ तो पहाड़ी पर गया, वहाँ समंदर निकला. मुझे लगता था कि सूरज अपने घर जा रहा है पर वो तो डूब जाता था. मुझे डूबने से बचाना था उसे. मैंने तैरना सीखा. मैं समंदर में तैर के जितना  आगे जाता सूरज उसके और आगे डूबता. कुछ दिनों में मैं तेज तैरना सीख गया फिर भी सूरज को डूबने से न बचा पाया.

मैं थोड़ा और बड़ा हुआ. मैंने एक नाव खरीद ली. मैं बहुत खुश हुआ कि अब मेरा सूरज नहीं डूबेगा. मैंने खूब तेज नाव चलायी. बहुत आगे तक भी गया पर सूरज को डूबने से न बचा पाया और अब भी पहले की तरह हर रोज अँधेरी हो जाती है मेरी दुनिया.

आपको क्या लगता है ये आग के गोले वाला सूरज है. जी नहीं, ये मेरी उम्मीद का सूरज है और समंदर भी ज्यादा दूर नहीं, बस मेरी आँखों का पानी है. जहाँ हर रोज मेरी उम्मीद का सूरज डूब जाया करता है.

–” विशाल नारायण”

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