#Kahani By Vishal Narayan

-” छोटा सा आदमी “–

छोटा सा आदमी हूँ, छोटी छोटी बातें करता हूँ. छोटी छोटी तुकबंदियाँ करता हूँ, छोटी छोटी कविताएँ लिखता हूँ और कहानियाँ भी छोटी यानि कि लघुकथाएँ लिखता हूँ. हाँ आज से दो साल पहले एक लंबी कहानी लिखने की शुरूआत की थी पर आज तक पूरी नहीं कर पाया. अब ये कहानी कछुए की मंथर चाल से चल रही है या खरगोश की तेज चाल से चलकर कहीं सो जा रही है इसका तो पता नहीं पर इतना जरूर पता है कि निकट भविष्य में ये पूरी होने वाली नहीं है.

 

वो कहते हैं न पिता का पुण्य और माँ का आशिर्वाद हमेशा साथ निभाते हैं. अब बाबूजी ने इस छोटे से लड़के का नाम विशाल रख दिया. अब ये लड़का बड़ा हो न हो, इसके कर्म बड़े हो न हो, पर जिन्दगी भर ये लड़का विशाल ही रहेगा और इसका नाम भी विशाल ही रहेगा. पर ये नाम विशाल तक हीं सीमित नहीं रहा. उन्होंने कर दिया विशाल नारायण. यानि कि नारायण वो भी विशाल. अब कायदे से देखिए तो हम जहाँ से आते हैँ उसके हिसाब से हमारा नाम होता विशाल कुमार जैसे बाकियों का हुआ करता है. मनोज कुमार, सनोज कुमार, पप्पु या फिर चिंटु, पिंटु कुमार पर हम विशाल नारायण हो गये. जिन लोंगों को शब्दों की थोड़ी बहुत पकड़ है वो आज भी पूछ देते हैं नारायण वो भी विशाल. कहाँ से लाए हो ये नाम.

 

आज भी नवाबी ठसक से खिलखिला उठते हैं हम. ” बाबूजी ने दिया है”. जैसे बचपन में नये डिजाईन के कपड़े, चॉकलेट देखकर लोग पूछ दिया करते थे “कहाँ से लाये” और हम खनक कर कहते “बाबूजी लाये हैं”. ठीक उसी तरह आज भी खनक उठते हैं हम. बचपन के खिलौने, बचपन की यादें भले हीं धूल धूसरीत हो जातीं हों पर उन्हें फिर से झाड़ पोंछकर, साफकर, करीने से सजा कर रखता हूँ. क्यूँ कि ये सारी चीजें मुझे विरासत मिली हैं वो भी मेरे बाबूजी से. आपको इन चीजों की कद्र हो न हो, आप इनपर फख्र करते हों न करते हों पर मैं करता हूँ. आज भी कभी इन चीजों, यादों के पास से गुजरता हूँ तो लगता है कि आज भी बाबूजी साथ हैं मेरें.

✍–” विशाल नारायण”

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