#Kahani by Vishal Narayan

“नून तेल रोटी”

 

अभी पूरे देश में सर्दी का प्रकोप जारी है. उत्तर भारत में तो पूरे दिन में बस कुछ एक घण्टों के लिए ही सूर्यनारायण के दर्शन हो पा रहे हैं. इस कँपकँपाती सर्दी में भी बरसात की कुछ रातें मुझे सिहरा जाती हैं.

 

बाबूजी गाँव के पहले सरकारी सेवक थे. जहाँ तक मुझे ख्याल है कुछेक फौजियों को छोड़कर उनसे पहले सरकारी नौकरी किसी को भी नसीब न थी. दूसरे चाचा वकिल थे. आमदनी ज्यादा हो न हो सुबह शाम लोगों की भीड़ हुआ करती थी. तीसरे चाचा कुछ खास नहीं करते थे तब भी पूरे परिवार का किराने का खर्चा बड़े आराम से सँभालते थे. सबसे छोटेवाले चाचा खेतीबारी देखा करते थे. दस बीघे की कास्तकार उस समय भी कमतर नही आँका जाता था और ना हीं आज भी.

 

हमारा परिवार उच्च वर्ग में भले न आता हो पर उच्च मध्यम वर्ग से कम भी न था. बाबूजी ने नौकरी लगने के साल दो साल के भीतर ही एम्ब्रेसड़र कार ले ली थी. उस समय हिंन्दुस्तान मोटर्स की एम्ब्रेसड़र कार के जलवे आज के ऑड़ी, फरारी से कहीं ज्यादा हुआ करते थे. इलाकें में गिनी चुनी गाडियाँ हुआ करती थीं. उनमें से एक ये भी थी. बाबूजी कॉलेज में पुस्तकालयाध्यक्ष थे पर मास्टर साहेब के नाम से जाने जाते थे. दूसरे चाचा वकिल साहेब थे और तीसरे वाले जब सिल्क के कुर्ते पर फोटोक्रोमैटीक चश्मा चढ़ा कर कार से निकलते तो परिवार का रूआब देखते बनता था. हम भी कभी कभी अपना रूतबा बढ़ाने के लिए, स्कूल के रिक्सेवाले को भगा देते और और कार से स्कूल जाते. स्कूल के सामने, कार से ऐसे छाती चौड़ी कर के निकलते मानो फाईटर प्लेन से उतरें हों और रिसीव करने के लिए दस बारह लोग खड़े हों. उस दिन पूरा क्लास कहता बाबूसाहब कार से आएँ हैं.

 

ये बाबूसाहबी का छाता हमें जाड़ा और गर्मी से तो जरूर बचा लेता पर बरसात का पानी उसमें छेद कर देता. पहले यह बूँद बूँद कर के टपकता पर थोड़े ही दिनों में परनाले बहने लगते. बाबूजी बिहार सरकार के कर्मचारी थे. उनका वेतन कब मिलेगा ये तय कर पाना विधी के नियंता के लिए भी संभव नहीं था पर फरवरी के बाद अगला वेतन अगस्त में मिलेगा ये बात सभी कर्मचारियों से लेकर बनियों, दुकानदारों तक को पता थी. बरसात में वकिल साहेब के मुवक्किल भी अपने अपने घरों में दुबक जाते और तीसरे चाचा जो बस चलवा के किरानों का ईंतजाम सँभालते थे उनकी गाड़ीयाँ भी जवाब दे जाती थीं.

 

 

जूलाई में जब बरसात शूरू होती हमारे हाथ थोड़े थोड़े दबते पर अगस्त और बरसात के अखिरी छड़ों में तो पूरे ही दब जाते. बरसात के लिए गर्मी से ही तैयारी शूरू हो जातीं. गर्मी में आलू, गोभी सूखाकर सुखौते बना लिए जाते. पहले इनसे काम चलता पर धीरे धीरे ये भी खत्म हो जाती. हाँ खेती से आनेवाले अनाज की कोई कमी न थी. गेहूँ, चावल तो बहुतायत में थे पर दाल और सब्जी प्लेट से गायब हो जाते साथ ही किराने का सामान और मसाले भी. बरसात के दिनों में हमें नून, तेल और रोटी खाकर गुजारा करना पड़ता. रोटीयाँ भी मोटी बनने लग जातीं थीं. उन मोटी और मिट्ठी रोटीयों के टुकडों को नमक और सरसो तेल के साथ खाना बहुतों को लिए कष्टमय हो सकता है पर हमारे लिए ऐसा कुछ नहीं था. और हम तब भी उसी ठसक के साथ घर से बाहर निकला करते थे. क्यूँ कि तब पूरा परिवार साथ  होता था और सबसे बड़ी बात ये कि बाबूजी साथ थे.

✍–” विशाल नारायण”

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