# Kahani by Vishal Narayan

मेरा अपना गुगल “–

 

कोई पूछे कि कौन सी जगह आपको सबसे ज्यादा सुकून, सबसे ज्यादा आराम और सबसे ज्यादा सुख मिलेगा. कोई देश के रमणीक स्थल का नाम लेगा तो कोई विदेश का. कोई यहाँ का तो कोई वहाँ का. हाँ कोई थोड़ा संयत होकर बताएगा तो माँ का नाम जरूर लेगा. पर मेरे जैसे इक्का दुक्का लोग ही मिलेंगे जो बाबूजी का नाम लेंगे. ये भगवान की ऐसी संरचना है जिसका ताप तो सबको दिखायी देता है पर इसका प्यार बहुत कम लोग ही देख पाते हैं या फिर बहुत कम लोग ही दिखा पाते हैं. और बाबूजी का नाम न लेने के पिछे एक वजह ये भी हो सकती है कि हो सकता है आप मेरे जितना खुशनसीब न रहे हों. आपको अपने बाबूजी के कंधे पर बैठकर मेला घुमने का मौका न मिला हो. ये जो बाबूजी का कंधा होता है न, बचपन में हिमालय से भी उँच्चा हुआ करता है. जहाँ बैठकर सारी दुनिया को इत्मिनान से निहारा जा सकता है.

 

बाबूजी के कंधे पर घुमना तो बचपन की बात हो गयी पर जब मैं बड़ा हुआ तब भी उनकी गोद में मेरा स्थायी आशियाना था. जितना सुकून उनकी गोद में मिलता, उतना कहीं नहीं था. हाँ डर भी लगता था. मैं गलतियाँ ही इतनी करता था कि मत पूछिए. पर डर भी तभी तक लगता, जबतक कि बाबूजी को न बता दूँ. बाबूजी को एकबार बता दिया फिर मेरा ड़र खत्म. हाँ, उस समय थोड़ा डाँटते थे पर डाँटने से ज्यादा समझाते थे.

 

उस समय गुगल का अता पता न था. गुगल लाँच हो भी गया हो पर इंटरनेट इतना सुलभ न था. पर उस समय भी मेरे पास गुगल था. मेरा अपना गुगल, मेरे बाबूजी. मुझे कहाँ जाना है, किस से मिलना है, कोई काम कैसे होगा इन सारे सवालों के जवाब थे उनके पास. मैं दिनभर घुम घाम के थक हार के घर लौटता तो उनका सबसे पहला सवाल यही होता, क्या हुआ. मेरा पहला जवाब होता कुछ नहीं. पर जब वो दुबारा पुछते मेरा गुस्सा, मेरी थकान बाहर आ जाती. दिनभर मेहनत की और कोई काम भी नहीं हो पाया. मुझे लगता उनके माथे पर भी चिंता की लकीरें उभरेंगी. उनके माथे पर भी बल आएगा पर होता इसके ठीक विपरीत. वो औऱ आराम से बैठ जाते मुझे पास बुलाते. बैठ जाइए. फिर आराम से बताते. पहले यहाँ जाइए, ऐसे कीजिए फिर आपका काम हो जाएगा. उनके बताए तरीके से मेरा कोई भी काम न रुका.

 

काम तो होते ही रहे पर कुछ दिनों बाद मेरा गुगल चला गया. चलो इंटरनेट पर आज बहुत कुछ उपलब्ध है पर जो सीख, जो समझदारी वो देकर गया न वो दुनिया के किसी ज्ञानकोष में नही. और इस से भी जरूरी वो पीठ पर हाथ फेरकर कहते थे न घबराओ नहीं सब ठीक हो जाएगा. वो सुकून, वो आनंद देने वाला कोई भी अमृत मुझे दुबारा नहीं मिल पाया.

✍–” विशाल नारायण ”

 

513 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.