#Kahani By Vishal Narayan

” बजरंगबली के प्रसाद “–

 

आज मकर संक्रांति है और संक्रांति पर बाबूजी की बात न हो तो मेरी संक्रांति अधुरी है. संक्रांति के प्रमुख अवयव चूरा, गुड़, तिलवा, तिलई बाबूजी के जमाने के प्रमुख स्नैक्स हुआ करते थे. जैसा कि आजकल के बच्चे चिप्स खाया करते हैं ठीक वैसे ही. संक्रांति के दिन दही, चूरा, गुड़, तिलवा, तिलई खाने के बाद बाबूजी एक वाक्या जरूर सुनाते. आप भी सुनिए बाबूजी की जुबानी.

 

बाबूजी पहलवान थे. कुश्ति लड़ने का शौक रखते थे. उन दिनों  गाड़ीयाँ कम चला करती थी तो सबकोई मेला देखने नहीं जा पाते थे. उस साल संक्रांति मेले में बाबूजी कुश्ति लड़ने लिए जा रहे थे तो मैंने कह दिया बाबूजी मेले से आते वक्त मिठाईयाँ जरूर लेते आइएगा. बाबूजी चले गए और हम खेल में लग गये.

 

दोपहर जब थोड़ा सा ढ़लने लगा तो मैंने देखा कि गाँव की बैलगगाड़ी आ रही है. मैं धूल धूसरित, ये ख्याल किए बिना कि बाबूजी कितना गुस्सा होंगे, भागा भागा बैलगाड़ी के पास पहुँच गया. बाबूजी गाड़ी से उतर आए. उनके हाथ में लाठी थी फिर भी मैंने हाथ आगे बढ़ा दिए. बाबूजी मिठाई. बाबूजी ने लाठी सँभाल के दो लठ्ठ आगे और दो लठ्ठ पिछे दिया. “इ लो बजरंगबली का प्रसाद”

 

इस वाक्ये को सुनकर हमसभी लोग ठठाकर हँस पड़ते और हर साल उतने ही जोर से हँसा करते. “इ लो बजरंगबली के प्रसाद.” आज बाबूजी को गये लगभग सात साल होने वाले हैं. मैं आज भी हँस रहा हूँ पर बाबूजी होते तो इस हँसी के ठहाके कुछ और होते. काश कि बाबूजी साथ होते.

–” विशाल नारायण ”

 

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