#Kahani by Vishal Narayan

” घबड़ाइए नहीं “–

पहले सुविधा के इतने संसाधन न थे. रेल, हवाई जहाज महानगरों तक सीमित थे. शहरों एवं मुख्य मार्गों पर बसें चला करती थीं. गाँवों में बैलगाड़ियाँ या फिर तांगे चला करते थे. फिर भी लोग अपने गंतव्य तक पहुँच जाते थे. आज तमाम साधनों, संसाधनों के बावजूद लोग अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाते. पहले किसी ने मोबाईल का नाम तक न सुना था फिर भी संदेश पहुँच जाया करते थे. आज सबकुछ है पर कोई बात ही नहीं है.

 

खैर ये उन दिनों की बात है जब गाड़ियाँ न थीं, मोबाईल न थे. किसी किसी घर में टीवी हुआ करती थी वो भी सादी वाली कुछ भी रंगीन नहीं था पर जीवन के रंगों में कोई कमी न थी. जीवन के उल्लास में, उसके आनंद में, उसकी निष्ठा में और जीजीविषा में कोई कमी न थी. बाबूजी शहर के कॉलेज में पदस्थपित थे तो परिवार का एक भाग शहर में रहा करता था ताकि आजीविका भी चलती रहे और बच्चों की पढ़ाई भी. एक दिन दोपहर तीन बजे गाँव से खबर आयी कि बाबा यानि कि दादाजी की तबीयत कुछ ठीक नहीं. खबर सुनते ही बाबूजी गाँव जाने के लिए तैयार हो गये. चार बजे वाली बस पकड़ेंगे और छ सात बजे तक गाँव. चाचा लोग मना करने लगे. बरखा पानी का दिन है. आपके घुटनों में ऐसे ही दर्द है और गाँव में बाबा के साथ छोटा भाई तो है ही. आप कल जाइएगा पर बाबूजी तो बाबूजी. एक हाथ में छड़ी और दूसरे हाथ से मुझे पकड़ा और निकल लिए.

 

बस ने आधी दूरी का सफर तय करा दिया था और आधा सफर हमें पैदल तय करना था. हम चाहते तो बस से ज्यादा सफर कर सकते थे और हमें पैदल कम चलना पड़ता. पर इसके लिए हमारा समय ज्यादा लगता. बस एक पूरा चक्कर काट के गाँव के दूसरे तरफ वाले रास्ते पर हमें छोड़ देती पर इसमें समय बहुत लगता. जितने देर में बस दूसरे रास्ते तक पहुँचती उससे पहले ही हम पैदल गाँव पहुँच जाते. घर पहुँचने की भी जल्दी थी तो मेहनत की परवाह कौन करता.

 

सूरज किनारे पर धरती को छूने लगा था. हमारी परछाई हमसे कई गुना बड़ी हो गयी थी. और हमारे पाँव अपने आप सरपट भागने लगे थे. थोड़ी ही देर में हमारी परछाई ने हमारा साथ छोड़ दिया. ऐसा न था कि सूरज डूब गया था. सूरज भी था पर बादल घिर आए थे और जबतक हम जबतक हम आसमान को एकटक निहार पाते तबतक बड़ी बड़ी बूँदें हमारे चेहरों पर टपक पड़ी थीं. बूँदों के टपकने की रफ्तार बढ़ती गयी और साथ साथ हमारे चलने की रफ्तार भी. हम कुछ देर बारिश से जूझे फिर हवा ने भी आजमाना शूरू कर दिया. हवाओं के थपेड़े हमें इधर उधर झूलने के लिए मजबुर करने लगे. हम भी सँभल सँभल कर चलने लगे. आगे हम रास्ते के जिस मोड़ पर पहुँचे वहाँ की मिट्टी चिकनी थी. एक तो चलना मुश्किल था उपर से रास्ते के दोनो तरफ तालाब. बारिश अपने उफान पर, हवा अपने तुफान पर और पाँव के नीचे चिकनी मिट्टी. हमारे पाँव फिसलने लगे थे. हमने अपने जूते निकाल कर हाथ में ले लिए. चिकनी मिट्टी में पाँव जमाने में थोड़ी सहूलियत हुई पर अगले ही पल हवा का ऐसा थपेड़ा आया कि मैं रास्ते के इस तरफ और बाबूजी रास्ते के उस तरफ गिर पड़े. बस गनिमत इतनी ही थी कि हम दोनों ने एक दूसरे के हाथ पकड़ रखे थे. बाबूजी की छड़ी दूर जा गिरी थी. वो चाहकर भी उठ नही सकते थे. मेरा उठना जरूरी था. मैं उठने के लिए जितनी जल्दबाजी करता उतनी तेजी से फिसलकर गिरता. मेरी बेचैनी बढ़ने लगी थी. बारिश में भी पसीने से तरबतर हो गया था मैं. बाबूजी ने मेरे हाथ को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया और धीरे से कहा. “घबड़ाइए नहीं.”

 

थोड़ी देर में बारिश थम गयी थी. हम मैले कुचैले ही सही, सकुशल घर पहुँच गये थे. बाबा भी कुछ दिनों में ठीक हो गये. आज भी तुफानों में घिर जाता हूँ. घबड़ा जाता हूँ. तब लगता है काश बाबूजी होते और हौले से कहते “घबड़ाइए नहीं.” और पल भर में सबकुछ ठीक हो जाता. काश कि बाबूजी होते.

–” विशाल नारायण ”

 

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