#Kavita by Acharya Amit

सत्ता जब निरंकुशता के

अधीन हो जाती है

तब उस पर अंकुश लगाना

और भी ज़रूरी हो जाता है

सबको अपनी स्वार्थ सिद्धि

आकांक्षाओं को पार लगाना है

किसी भी कीमत पर

दबने वाले जानते ही नही

उन्हें कुचल कौन रहा है

झंडा लेकर चलने वाले भी अबोध है

उस डंडाधारी से जो उनके

मूल को समूल नष्ट करने पर आतुर है

सदियों की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही

गुलामी की दासता से गर छुटकारा पाना है

तो पहले उस सोच को बदलना होगा

जिसने इंसान को जात-धर्म-भाषा-रंग-रूप के

मतभेद में उलझा रखा है पैसे वाले कौन है

किस मज़हब के है कोई नही पूछता है

वो भी तो इंसान ही है और इंसान

इंसान से कैसे अलग हो सकता है

जो एक के लिए वाज़िब है वो दूसरे के लिए भी

यही सोच जो बरसों से विचारों की लड़ाई लड़ रही है लेकिन अपने वजूद से दासता स्वीकार चले आ रही है सिर्फ कहती है हम ऐसा नही करेंगे

हम वैसा नही होने देंगे लेकिन सब करते है

तो बदलाव तो उनके यहां आएगा न जो

यह सब करा रहे है लोगो को अपने ही

निज़ी मतों में झुलसाकर लड़वाकर

फुट डालकर शासन कर रहे है

और जब तक करते रहेंगे जब तक

हम सोच से परिपक्व नही हो जाते

इसमें समय लगा है और भी लगेगा

लेकिन जब वो सही सोच साक्षर हो जाएगी

तब वो बिगुल बजेगा जो बिना खून की एक बूंद बहाये सब कुछ बदलकर रख देगा…..

आचार्य अमित

 

 

 

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