#Kavita by Acharya Amit

मेरा यह दिल

मेरा यह ज़िस्म

मेरी यह रूह तड़पती है

बताओं कौन सा प्राणी है

जिस पर क्रोधाग्नि धधकती है

भड़क उट्ठी है जो ज्वाला

अब यहां हर एक सीने में

भस्म कर देगी यह उनको

जो धूर्त वहशी और

हृदयहीन क्रूर सारे है

जिन्होंने नौंच डाला था

बनकर गिद्ध एक मासूम बच्ची को

उनकी माँ बहन बीवी और बेटी पर

अब सबकी  है

हुआ क्या देश के नेताओं तुम्हें

कुछ तुम तो बोलो जी

जहां भगवान बसता है

वहीं अधर्म का डेरा है

करे क्या पेड़ चन्दन का

हमेशा उस पर सर्पों का पहरा है

पुलिस भी भेंट चढ़ती हो

जिसकी दहलीज़ पर अक़्सर

कोई उम्मीद क्या रखे बताओं

उस बदजात से हरदम

जो लहुँ पीने का आदि हो

अपनी आस्तीनों का

कहे क्या उसको बोलो तुम

जो रहनुमा बनकर लुटे है

बनेगा क्या उस मूरत का

जो बनते-बनते टूटे है

मर्म वो खाक़ समझेगा

दिया है ज़ख्म ही जिसने

मेरा दावा है ऐसे सिस्टम को

जलाकर राख ही कर दो

जहां इंसान न हो इंसान

उसे खाक़-ए-मशान तुम कर दो

नही चाहिए साहिब हमें काग़ज़ की लाचारी

हम भूखे ही अच्छे है हमें नही पेट यूं भरना

तिल-तिल मरते रहना यूं

मानो दिये कि लौ का हो घटना

जला दो सरे बाज़ार उसको

जो वहशी दरिंदा है

किसी भी धर्म का हो वो

कहीं का भी हो बाशिंदा

मरेगा हर हाल में अब वो

यही मेरा बस कहना है

जो भी साथ देगा उसका

उसे भी साथ मरणा है

कमीनो की ऐसी नस्लों को अब

जड़ से मिटाना है

हुआ जो आज है नही

अब उसको कभी दोहराना है….

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आचार्य अमित

 

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