#Kavita by Acharya Amit

उम्र कब किस तरह

खुशबू बिखेरे क्या पता

आईना वही है

जो अक्स सही दिखाए

कमी बताये न बताये

मगर गुमराही पर न ले जाये

बहुत से हादसे है

जो गुज़रे है इस क़दर

अपना भी कोई नही है

और बेगाना भी जहां नही है

रहगुज़र जो शांत है

कब अशांत हो चले

किसको पता किसको ख़बर

मन्ज़िल भी वही है

और बाकी भी वही सफ़र

जो तय कर रहे है

बाज़ार के भाव को

कुछ खरीदते नही है

सिर्फ़ बेचने के व्यापारी है

कभी खरीद कर देखे

दो वक्त का राशन

कभी बैंक की कतार में

शामिल तो हो

कभी तो बाजार से

सब्ज़िया तो खरीदे

जान जाएंगे वो

क्या होती है कीमत

क्या होती है महंगाई

और क्यों मरता है गरीब

क्यों हसरत में बूढ़ी हो

रही है आरज़ू की अर्ज़ियाँ

कौन बताएगा उनको

पढ़कर यह शिकायती ख़त

जो पढ़कर चले है

वो साहिब हो गए है

जिनको काला अक्षर

भैंस बराबर है

उनको क्या मतलब

कुछ कागज़ पर घसीटने से

पढ़ना और पढ़ाना जहां

बीती बात हो गई

समझना और समझाने की

जहां रात हो गई

उनसे क्या उम्मीद अब करें

जिनकी दूसरों के सर पर

ठीकरा फोड़ने में ही

और अपने आप में

दड़बों में जानवर से रहने में

पेड़ो को कुचकलर

मोटर गाड़ियों बिल्डिंगों

फ्लाईओवर स्मार्ट सिटी बनाने में

गांव को नरक बनाने में

इंसान को इंसान से

कोसो दूर ले जाने में

बस अपनी असल जिंदगी ही

एक अनकही फ़रयाद हो गई

कुछ नही बदलने वाला

यहां वक़्त नही बदलता

हालात नही बदलते

सिर्फ सरकारें बदलती है

और उन्ही के दम से

गरीब की मैयत निकलती है

जो अमीर है वो और भी

सेठ जी बन रहे है

जो गरीब किसान है बेचारे

जो ऊगा रहे है अनाज़ और

भर रहे है पेट सबका

वही मर रहे है

आत्महत्या कर रहे है

आप ही अंदाज़ कीजिये

जिस देश का बचपन भूखा है

उस देश की जवानी क्या होगी

और जिस देश की जवानी

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और सेल्फी लेने में व्यस्त हो

उस देश की कहानी क्या होगी…

 

आचार्य अमित

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