#Kavita by Acharya Amit

जहां दिलो में मुहब्बत ज़िंदा है

समझना वहां आज भी

आदमियत बसती है

वरना कोई ऐसा मुहल्ला-

गली-नुक्कड़-चौराहा

बता दो जहां इंसान की

इंसान से बाहर हस्ती है

हर कोई अपने को दूसरे से

बेहतर करने पर उतारू है

कोई नही मानता चन्द

काग़ज़ के टुकड़े आज भी

रिश्तों पर भारी है

बिक रही इंसानियत

गली-गली बाज़ारों में

सारे शैदाई ख़ड़े है

बनकर बुत अँधियारो में

कोई नही सुनता अपने

मतलब से बाहर की बात

इंसानियत को कुतर रहे है

यह पूछ-पूछकर जात-पात

बंट रहे है भाषा और झूठे

धर्म के गलियारों में

कैसी देखो हौड़ मची है

इन नामाकूल सियासतदारों में

कबीर के दोहे भूल गए है

मीरा की भक्ति क्या समझेंगे

यह प्रेमचन्द को रौंदने वाले

हबीब तन्वीर को क्या समझेंगे

आगा हश्र कश्मीरी का नाम

जिन्हें अब याद नही

मंटो और मोलियर की

वो बारीकी क्या समझेंगे

खून बहाने के मक़सद को

जिनका ज़मीर बस कहता है

उस दिल मे क्या राम या अल्लाह!

जहां इंसान नही रहता है…

मूक बधिर बन ताक़ रहे है

सब एक दूसरे को यूं मानो

इनकी कोई खता नही है

सब अपनी ही ग़लती रही हो मानो…

अंधियारे घर के आंगन में

उम्मीद का एक दीपक ही बहुत है

पतझर के वीराने गुलशन में

खुशबू का एक फूल बहुत है

अभी भी क्या हम खोएंगे यारों

कितना कुछ हम खो है चुके

कितने भाई-बहनों के मातम में

हम अलहदा होकर रो है चुके

आओं मिलकर दूर करें इस

अमानवता के नंगे नाच को

बीते कल को बचा न पाए..

बचा ले मिलकर हम

आओं अपने इस

खूबसूरत आज को….

आचार्य अमित

 

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