#Kavita by Acharya Amit

गर लिखते हो साहब!

कभी हमारा दर्द भी लिखना

एक छोटे से बच्चे ने

ये कहकर मेरी ओर

अपना हाथ

रोटी के लिये बढा दिया

और बोला स्कूल जाता हूँ

इसी फुटपाथ पर

ये दुनियावाले

जिन्हें कोई पुलिसिया

कोई कार वाला बाबू

या कोई भाई साहब!

कहकर सम्बोधन देता है

और आप सभी मेरे

गुरुजन है

जो सीखा देते है

सीख लेता हूँ

आख़िर मुझे यह सब

लौटाना भी तो यहीं है

इन्ही जैसो को

मुझ जैसों के बीच मे

भूख क्या होती है

कभी इस फुटपाथ पर

गर्म धूप में

अपने नंगे ज़िस्म को

बिछौना बनाकर

महसूस कीजिये

वो जो अग्न महसूस होगी

तुम्हे उस दिन उस पल

हम रोज़ महसूस करते है

मैंने अपनी जेब से

कुछ पैसे उसे देने चाहे

मग़र हाथ आगे न बढ़ सका

मैं सोचता रहा

मैं तो इसे आश्वाशन

भी नही दे सकता

इसने जो मुझे दे दिया

उसका मुक़ाबला

काग़ज़ के चंद टुकड़े

नही कर सकते

फ़िर उसने एक

ग़ुलाब का टूटा हुआ

मुरझाया सा फूल

मेरी ओर कर दिया

और बोला रख लीजिए साहब!

आप आदमी भले लगते है

वरना इतना टाइम तक

कोई मुझे नही सुनता….

आप पैसा नही भी देंगे

तो भी चलेगा….

आचार्य अमित

 

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