#Kavita by Acharya Amit

लूट रही अस्मत को

बचा रही है धर्मान्धता

बिक रहा भगवान है

खरीद रहा इंसान है

और पिस रहा ईमान है

ऊंघ रहे बेईमान देखो

पा रहे सम्मान है

ऊंच नीच होने को आतुर है

खो रहा बलिदान है

जात-पात के ठेकेदार

कर रहे बलात्कार है

पहले बांटा इंसान को

अब बांट रहे संविधान है

आज भी चले आओ कहीं

अम्बेडकर सुभाष गांधी तिलक

नारी का हो रहा घर-घर अपमान है

कहने की तो बात नही है

फिर भी यारों मेरा देश महान है…..

आचार्य अमित

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.