#Kavita by Acharya Amit

चारों तरफ अंधेरा है
फिर भी उजालों की आस है
जितना समंदर में पानी है
उससे कहीं ज़्यादा मुझमें प्यास है
तज़ुर्बा अपनी तरक़्क़ी का
लोग थौंपने को मुझ पर आतुर है
मेरा अधूरा ज्ञान है
सबका यही क़यास है
मौज डुबोने को मुझें
कुछ बैचेन सी है इस क़दर
मानो मुझमें अभी भी
कुछ जितने की आस है
मैं थक गया हुँ
या हार गया हुँ
यह सब कहते फिरते है
लेकिन भूल जाते है
जीतने के लिए हारना
तो एक शुरुआत है…
आचार्य अमित

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