#Kavita by Acharya Amit

रख दिया रात के मुसाफ़िर
चरागों को समेटकर
सुबह की भौर ने
कर दिया आतुर मन-चितवन
सुबह की भौर ने
जाने कितनी उदास ज़िन्दगियों में
भर दिया जीने का जोश
सुबह की भौर ने
फूल कलियां पत्ते सभी नहाए से
कर दिए सुबह की भौर ने
दी है फिर वीरां सड़कों पर दस्तक
सुबह की भौर ने
सुबह हुई यूँ मानो
एक उम्मीद फिर जगी
खुल गई वो तमाम आंखें
जो देख रही थी तमाशा
आंखें बांधे टकटकी
फिर यूँ भुला दिया
उन अंधेरों को स्याह उजालों ने
मानो कभी नही थी रात
कभी नही था दर्द का मातम
कभी बैचेन नही थी सांसें
कभी खौलता हुआ खून
बर्फ़ नही बना था
कभी नही बढ़ी थी महंगाई
कहीं नही था कोई भूख से
बिलखता हुआ बचपन
कहीं भस्म नही हुई थी
ज़ौहर में अबलाएं
कभी नही हुए थे
कहीं किसी गली-नुक्कड़ में
किसी मौहल्ले में बलात्कार
कहीं कोई ढोंगी धर्मान्धता का
कोई ढकोसला नही था
कहीं नही खो रही थी
मानवता अपनी मासूमियत
और जाने कितने ही
अनजान किसान गुमनामी की
मौत न मरे थे
और कहीं किसी देश का गरीब
और गरीब नही हो रहा था
कोई बेरोज़गारी प्रदूषण या
कोई समस्या नही थी
कहने को तो सब कुछ था
देश विकास कर रहा था
एक सुबह क्या हुई
मानो सब बदल गया
जाने क्या जादू चला दिया
इस सुबह भौर ने…..
आचार्य अमित

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