#Kavita by Acharya Amit

समझ नही आता
तुम बदल गई हो या
हम बदल गए है
लगता तो ऐसे है
जैसे सब बदल गए है
वक़्त भी बेवक़्त
बदलता नही चाल अपनी
जाने कैसे हम
अपनी ही सुध बदल गए है…
हवाएं भी चलती है
बारिश भी होती है
धूंप भी निकलती है
बिजली भी कड़कती है
और इंद्रधनुष भी बनता है
फिर भी जाने कैसे
मौसम के तेवर बदल गए है
नशा भी नही है
सुध-बुध भी बिसराई है
जाने यह कौन सी
क़यामत नज़र आई है
तुमको भी ख़बर है
और ज़माने को भी पता है
अपना ही कोई साया
अब अपना न रहा है
इरादों के तो पाबंद
तुम सदा से रहे हो
फिर कैसे कह दूं
तुम बदल गए हो
अब मिलने में
वो मज़ा नही है
जो रस है
इस तन्हाई में
तुम कोयल सी कुको
बस यही दुआ है
दिल की गहराई से
कसमों का क्या है ?
गर टूट भी जाएं…
माथे पर तुम्हारे कभी
बल न उभर पाए
मुस्कान तुम्हारी सदा
खुशबू बने बहारों की
आज़माइश यह तुम्हारी हो
चन्द चाले सितारों की
हमारे शब्दों में
गीतों में सार में
अथक प्रयास में
अनर्गल वार्तालाप में
धीर -अधीर होने
हँसने-रोने में
जागने-सोने में
सुनने-सुनाने में
बुनने-बनाने में आदि
सब तुम ही रही हो
इन बातों का अर्थ
तुम यह मत समझना
अब की हम बदल गए है…

आचार्य अमित

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