#Kavita by Acharya Amit

एक अनकही बेचैनी को

कब तलक छुपाऊं मैं

किन रास्तों से गुजरा हुँ

किन रास्तों पर जाऊं मैं

कौन सा पथिक रहबर

कौन सी रहगुज़र मेरी

मंज़िल भी मेरी सामने

और मंज़िल को न पाऊं मैं

दरख़्त सरीखे लोग है

लोगों में संजोग है

कुछ जोग है

कुछ भोग है

अरे!लोग तो

फिर लोग है!

न अदब उनका

न अदा उनकी

यदा-कदा ज़बां उनकी

बेच रहे ईमान है

कहते हम भगवान है

इंसान जो बनकर आया

इंसान कहाँ वो रह पाया

जानवर अब हो रहा इंसान

इंसान बन गया एक हैवान

मासूम बचपन कुचल रहा

निर्दोष अबलाएं है मर रही

गरीब की क्या ज़िन्दगी

पल-पल जो है मर रही

घट रही रुमानियत

बढ़ रहा है बाज़ार है

यारों वो भी दौर एक

यारो यह भी दौर है

घरौंदे बने है

चिड़ियां के घोंसले से

परिवार हो रहा अब एकल

संयुक्त सभ्यता किताबों से

और संस्कृति से भी

अब हो रही पल-पल ओझल

बोझिल हो रही सांसे

झूट रहा है अपनापन

आओं मिलकर मोल करें

बड़ा वही जो झोल करें

जिसका जितना झोल हुआ

उतना वो अनमोल हुआ….

पार्थ सभी देख रहे ठगे से

खो गए कहाँ उनके कृष्ण

कर्ण बनो या बनो कृष्ण

या जो भी बनना है बनो

अपना ज़मीर कायम रखों

अपने मे पुख़्ता तुम रहो

बन रहे सब अंधभक्त है

माताएं सब है गांधारी

संजय की मति हरी जा चुकी

महाभारत पर भारत हुआ भारी

सत्ता के जो भी आश्रित है

सभी उनसे ही श्रापित है…..

 

आचार्य अमित

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