#Kavita by Acharya Amit

बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
बेटी बचाओ का नारा हो
या फिर बेटी पढ़ाओ की गिनती हो
सिलेंडर के बढ़ते दाम हो
या फिर पेट्रोल डीजल की
आसमान छूती कीमतें
फिर भी न जीना इतना
कभी मुहाल हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
हाथ भी देखा हाथी भी देखा
कमल भी देखा देखी
झाडूदारी भी
जनता मूक बधिर
दर्शक बनी है
वो बन रहे है मदारी भी
कोई किसी को नही देख रहा
सभी अपनी रोटियां सेक रहे है
जिससे जितना बिक सकता है
वो अपने को बेक रहे है
अपनी आमद उनकी ख़ुशामद
नॉट पे वोट की खरीद-फ़रोख़्त
दारू पीना जुआ खेलना
जुटे रहना गधों की तरह
उनके तलवों को चाटने में
उनकी तशरीफ़ को सहलाने में
बलात्कार घूसखोरी जमाखोरी
या गरीबी और महंगाई कब नही थी
बस फ़र्क़ सिर्फ इतना है यारों
अब प्रोफाइल स्टेटस ज़रूरी है
तब अपना आत्मसम्मान जीने की
पहचान हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो
शैतान हुआ करता था
धर्म तब भी अधर्म था
लेकिन इतनी धर्मांधता
की आमद न थी
पहले तो बेटी बचाओ अभियान
का जयकारा था अब तो
बेटा बचाओ का उदघोष भी
जयघोष बन जायेगा
कैसा कानून बना है देखो
ज़िस्म का व्यापार जो करती है
मज़बूरी और लाचारी में
वो नाजायज़ ही रहेगी
आज की दुनियादारी में
जिनके पिछवाड़े के पुट्ठे
उनसे सम्भलते नही है
अब वो राज करेंगे
मिलकर आपसदारी में
जिसको जायज़ करना था
वो अपनी क़िस्मत पर रोती है
और जिसका कोई मेल नही था
वो अट्टहास कर उसकी
लाचारी पर हंसता है
भूख तब भी भुखमरी में
पेट की भट्टी में न आती थी
कोर – कोर को तब भी
तरसता यूँ आम हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
वो कह रहे थे
हमें बस एक मौक़ा दो
बहुमत के साथ आने का
या हमारी सरकार ही
बन जाने का
हाथ के ऊपर तब
कमल न शान हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
नोटबन्दी भी कर के देख ली
जीएसटी का भी ठीकरा
सर पर फोड़ दिया
भक्तों का पाखण्ड भी
अब चूर हुआ
ज्ञानवान नौजवान अब
पकोड़े तलने और
चाय बेचने की फिक्र में है
सच कहूं तो पहले
कभी वर्तमान न इतना
भविष्य की ढाल
हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
लोग मर भी रहे है
लोग तर भी रहे है
लोग कर भी रहे है
लोग धर भी रहे है
लोग पक्ष में भी बहुत है
लोग विपक्ष में भी बहुतायत है
अमीर तब भी अमीर था
ग़रीब तब भी ग़रीब था
जनता तब भी भीड़चाल थी
उल्लुओं के पक्ष में
तब भी अख़्तियार थे
आम इंसान तब भी
मुँह ताकता था
चायपत्ती के फंकी के सहारे
अपने सभी दुःख तारता था
मरने वालों में अहम पहल
तब भी किसान हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
फेसबुक और व्हाट्सअप या
कहो ट्विटर सब धरना और
बहसों मुहबहिसा छिड़ा रहता है
हर व्यक्ति जो देश के हित मे था
अब नेटपेक पर व्यस्त रहता है
औरतें तो मानो मोती दान कर आई है
यूट्यूब पर उनकी कूकरी और
फेसबुक पर सबकी सेल्फी ही छाई है
सब कुछ अध्यात्म से किताबी और
किताबो से प्रतीकात्मक बन रहा है
इंसान किसी और को नही
बस अपने आप को ही छल रहा है
अपनेपन की सभी किस्तें
कहीं पीछे छूट रही है
दिखावे के सभी रिश्ते
मानो ज़हर घोल रहे है
इंसान का उस समय
इंसान पर विश्वास हुआ करता था
बात उन दिनों की है
जब विपक्ष इंसान
हुआ करता था
पक्ष जो था वो शैतान
हुआ करता था….
आज पक्ष और विपक्ष
दोनों ही अपनी-अपनी
चांदी छन रहे है
बाहरी तौर पर सिसकियों का
ढकोसला है और अंदरूनी
सभी अपनेआप में तन रहे है
कल का मरता आज मरे
और आज का मरता मरे अभी
हमने कब ग़रीब की चिंता की है
जो चिंता करेंगे आज अभी
विचारों में उलझाकर लोगों को
सब उंगली करके बैठे है
भूल गए है इन्हें सहलाने वाले भी
अब इनसे सीख-सीख ऐंठे है
आज नही कल सही
जिस दिन उनका ज़मीर जागेगा
न कोई पुलिस होगी
न कोई कोर्ट ही होगा
सीधा वो सुनवाई कर
अपना निशाना साधेगा
उसकी लाठी बेआवाज़ है
मग़र बड़े भाव से पड़ती है
जिसकी जैसी करनी रही है
उसको वैसी भरनी पड़ती है…..

आचार्य अमित

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