# Kavita by Acharya Amit

दिन उग आया है
रात जा चुकी है
उजालों का नूर धरा को
अपने खुशनुमा आग़ोश में
भरने को आतुर है
छिटक रही है पत्तों पर
कुछ शबनमी बूंदे यूँ
मानो आरती की थाली में
इत्र की सुगंध बिखर रही हो
फूल भी अपने अंदाज पर
मुस्कुरा रहे हो मानो
नदी झरने पर्वत पेड़
सभी बड़े मनोहर लग रहे है
यह सुबह तो वही है
जो हर रात के बाद आती है
मगर हर दिन एक नया
पैग़ाम भी लाती है
उदासी कितनी भी घनी हो
अंधेरा कितना भी स्याह गहन हो
सुबह फिर भी हर रात का
सीना चीरकर अपने
होने का एहसास करा जाती है
मुर्गा बांघ देने में
चूक कर सकता है
अंधेरा दूर होने में
देर कर सकता है
लेकिन सुबह भौर प्रभात
सवेरा हम इसे
किसी भी नाम से
क्यों न पुकारे इसे तो
मानव जीवन को
जीवन दर्शन का पाठ
पढ़ाने और एक नया
अध्याय गढ़ने को
हमेशा चली आती है…..
. आचार्य अमित

Leave a Reply

Your email address will not be published.