#Kavita by Acharya Amit

बुझते दियों को जलाने में
कुछ हसरतें भी जल गई
बेख़ुदी की इस ज़माने में
न उम्र न जन्म न दीवार कोई
कोई तो पार हो गया
इस पार आने जाने में
ज़ख़्म को दर्द क्या
वो तो सिला है बावफ़ा वफ़ाओं का
बेवफ़ा कोई हो गया
तो क्या हुआ ज़माने में
न संग न राहत न दवा कोई
जो भी है वो बस
दो पल का शिकवा है
दोस्त भी दोस्त कहाँ रहे
अब दुश्मनी के इस ज़माने में
कोई दुआ भी क्या करें
सबको अपना म्यार चाहिए
न अज़्म कोई बुलन्द है
फिर भी वक़ार चाहिए
कोई किसी को क्या कहे
जब दोषी है सब ज़माने में..

आचार्य अमित

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