#Kavita by Acharya Amit

हरपल कुछ घट रहा है
कुछ अभद्र सा
कुछ रसिक सा
कुछ तीखापन लिए
अपने तैवर को
कील से भी नुकीला
बना रहा है
वो अवसाद का पतन
होनी तो होकर ही रहती है
क्योंकि वो तो एक महान
प्रबल दावेदार है
वक़्त की उस बिसात की
जिस पर बिछे हुए
हम सब मोहरे मात्र है
किंतु जब कुछ ऐसा
घट जाता है कहीं
जो रोका जा सकता था
जिसे थोड़ी सजगता के साथ
थोड़े संयम के साथ
और थोड़ी निर्भीकता के साथ
थोड़ी मानवता के साथ
और सच कहूं तो
थोड़ी नही बहुत सी
मानवता के साथ छला जा सकता था
बदला जा सकता था
दोष प्रशासन का ही मात्र नही
स्वयं हमारा भी है
हम किसी की तरफ
उंगली उठाने से स्वयं को
बचा नही सकते
जो अमृतसर में घटा
वो कहीं भी घट सकता है
कभी भी घट सकता है
मुस्कुराहट आह! के गहरे
अवसाद की त्रासदी में लिप्त हो सकती है
और वो गूढ़ अंधकार
कभी न ख़त्म होने वाला
स्याह काला दिन बनकर उभर सकता है………
आचार्य अमित

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