#Kavita by Acharya Amit

एहसास कब अपने नही थे…..

कब साथ चल सका
कोई दो क़दम भी
बिना स्वार्थ के
तुम मिले
कुछ नया सा लगा
साथ भी और
तुम्हारे होने का एहसास भी
एहसास कब अपने नही थे
सच कहूँ जब
तुम नही मिले थे
दिल मे चाहत तो बहुत थी
लेकिन चाहत की कली के पुष्प
सही मायनों में खिले नही थे
आंखों में ख़्वाब तो
बेतहाशा रहे लेकिन
उन ख़्वाबों के कोई
मायने तुम बिन नही थे
यह एहसास हमेशा
मेरे दिल के किसी
कोने में यूं दफ़्न थे
मानो दिल तो था
लेकिन दिल मे जीने के
अरमान नही थे
अब तुम ही कहो
नदी समंदर पर्वत
फूल पत्ती पनघट नीर
वेदों की वाकपटुता
अज्ञानियों का ज्ञान
पक्षियों की चहचाहट
मधुशाला का अमृत
इंद्रधनुष के रंग
प्रकृति का सौंदर्य
खेतों की पगडंडियां
छतों की मुँडेर
पेड़ों की सरसराहट
झरनों की मधुरता
रागों की रागिनी आदि
मेरे लिए सब तुम ही हो
अब तुम ही कहो
तुम कब अपने नही थे…..
आचार्य अमित

Leave a Reply

Your email address will not be published.