#Kavita by Acharya Amit

क्या है तुम्हारे मन में
नही जान पाया कोई
और न ही जान सकेगा
तुम हँसते हो पर
मुस्कुराते नही हो
इतने अकेले क्यों हो
क्यों हँसते हो स्वयं पर
और इतराते हो ऐसे
मानो स्वयं को जीत सा लिया हो
काश!यह जीतना भी
उतना ही सच होता
जितना कि तुम्हारा
यह झूठ सच है……
आचार्य अमित

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