#Kavita by Acharya Amit

कुछ बोलते हुए तीर
कुछ खोलते हुए कानों को
कुछ दुखाते हुए दिल को
कुछ नमक लगाते हुए छालों को
संवाद भी करते है
ख़ामोश यूँ रहकर मानो
किसी ने भेद दी हो
पक्षी की वो आंख
जो दिखती थी सिर्फ
कभी अर्जुन को
कुछ क्रोध को दे दिया
जन्म किसी दुर्योधन के
बना दिया है उसको
खानाबदोश आवारा बंजारा
छीन लेने को आतुर है असमय
यह समय का पहिया
अश्वथामा की उस मणि को
जिसने सम्भाल रखा है
अभी तक उसके गर्भ में प्रलय को
आज फिर महाभारत किसी
कृष्ण किसी द्रौपदी की
राह यूँ तक़ती है
मानो फोड़ना चाहती है
वो ठीकरा अपने किमकर्तव्यविमूढ़ सवालों का
किसी अनजान के हित में
और होना चाहती है बरी
अपनी परिक्षा की चरमधुली से……
आचार्य अमित

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